Monday, February 21, 2011

केंद्र की सबसे बड़ी जमीन गणना शुरू


भूमि घोटालों का खुलासा होते ही केंद्रीय विभागों के भीतर सरकारी जमीनों को लेकर अफरातफरी मच गई है। अपनी तरह की पहली एकमुश्त कवायद में सभी केंद्रीय मंत्रालयों व सार्वजनिक उपक्रमों ने केंद्र सरकार की जमीनों की देशव्यापी गणना शुरू कर दी है। पूरी सरकार पिछले करीब एक सप्ताह से अपनी भू-संपत्तियों के मौजूदा हिसाब-किताब, आवंटन, उपयोग आदि के आंकड़े जुटाने में लगी है। कैबिनेट सचिवालय ने सरकारी जमीनों का खाता-बही सुधारने यानी असेट रजिस्टर बनाने के लिए ग्यारह केंद्रीय सचिवों से लैस एक उच्चस्तरीय समिति भी तैनात कर दी है, जो विभागों से उनकी जमीनों की कैफियत तलब कर रही है। समिति की रिपोर्ट चार सप्ताह में आएगी। एक इकाई के रूप में सरकार व सरकारी कंपनियां (रक्षा, रेलवे, खनन सहित) देश में भूसंपत्तियों की सबसे बड़ी मालिक हैं। रक्षा भू संपत्ति के घोटालों के बाद सरकार को डर है कि इस तरह के मामले अन्य विभागों में भी हो सकते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार पर बनी केंद्रीय मंत्रियों की समिति की निगाह सबसे पहले अकूत कीमत वाली जमीनों पर बैठे पर सरकारी विभागों पर गई है। सरकारी जमीनों के हिसाब-किताब को ठीक करने के लिए बनी समिति के अध्यक्ष वित्त सचिव अशोक चावला हैं। पेट्रोलियम, पर्यावरण, कोयला, दूरसंचार, रक्षा, खान, जल संसाधन, भू-संपत्ति, व्यय विभागों के सचिवों के अलावा फिक्की और सीआइआइ के प्रतिनिधि भी इस समिति में हैं। सबसे पहला काम सरकारी जमीनों के आंकड़े जुटाने का है। कैबिनेट सचिवालय के जरिए केंद्र सरकार के सभी विभागों को यह निर्देश दे दिया गया है कि वह अपनी जमीनों के इस्तेमाल व खाली भूमि का पूरा आंकड़ा तैयार करें। केंद्र सरकार के उपक्रम भी इस कवायद के तहत आएंगे। इस कदम से सरकारी जमीनों के आवंटन की पुरानी फाइलें फिर खुलने लगी हैं और मंत्रालयों ने असेट रजिस्टर बनाने का काम शुरू कर दिया है। सचिवों की समिति यह भी जांच रही है कि जमीनों को लेकर मौजूदा कानूनी ढांचा कितना सक्षम व प्रासंगिक है और जमीनों की कीमत तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। नीतिगत मामलों पर शोध करने वाली संस्था सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च इस समिति की कंसल्टेंट है। केंद्रीय मंत्रालयों व विभागों में सरकारी जमीनों का कोई एकमुश्त हिसाब-किताब उपलब्ध नहीं है। प्रत्येक विभाग अपनी जमीनों का हिसाब रखता है। कहने को सरकार में एक भू-संसाधन विभाग भी है, लेकिन यह ग्रामीण विकास मंत्रालय के मातहत है और इसका रिश्ता जमीनों के वाणिज्यिक इस्तेमाल से नहीं, बल्कि भूमि सुधारों आदि से है।

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