भारत में खेती की जमीन जिस तेजी के साथ गैर-खेतिहर कार्यो के खाते में जा रही है, उस पर मुख्यधारा का मीडिया लगभग पूरी तरह चुप है। विकास को एक सीधी रेखा में देखने वाले लोग इसे अर्थव्यवस्था का एक जरूरी अनुषंग मानकर चल रहे हैं। यह लॉबी अर्थव्यवस्था के विस्तार, जनसंख्या प्रसार तथा शहरीकरण की एक सहज समीकरण के रूप में व्याख्या करती है और इसे उनकी तार्किक परिणति के रूप में देखती है। ये सारे तर्क दरअसल बाहरी सूचकांकों को कुछ इस तरह विन्यस्त करते हैं कि एक आम सजग नागरिक को कभी पता नहीं चल पाता कि असल में यह प्रक्रिया कैसे और कहां से चल रही है। पिछले दो दशकों में दिल्ली-एनसीआर का एक बड़ा क्षेत्र नित नए उगते उपनगरों की आकाशगंगा में लुप्त हो चुका है। और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रक्ति्रया सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। देश का हर महानगर ऐसे ही उपनगरों और आवासीय छत्तों से घिरता जा रहा है। ध्यान रहे कि इस आवासीय प्रसार में जनता फ्लैट्स वाली श्रेणी शामिल नहीं है। यह समूचा विस्तार मध्य वर्ग की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, लेकिन यहां यह याद रखना जरूरी है कि खेतिहर जमीन पर आवासीय निर्माण, उसका गैर-खेतिहर उपयोग सिर्फ एक पहलू है। जमीन की बढ़ती खरीद-फरोख्त का मूल स्त्रोत असल में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की वृहद प्रक्ति्रया में निहित है। ध्यान से देखें तो खेती की जमीन का यह गैर-खेतिहर इस्तेमाल हमारी अर्थव्यवस्था की एक गंभीर विकृति की ओर संकेत करता है। इस सच से इनकार करना मुश्किल है कि लाइसेंस-परमिट राज की जकड़नों को खत्म करने के नाम पर भारतीय राज्य ने कॉरपोरेट समूहों को पिछले दो दशकों में अकूत धन कमाने की सुविधाएं मुहैया कराई है, जबकि दूसरी तरफ अब मझोले किसानों की स्थिति भी ऐसी नहीं रह गई है कि वे खेती को आजीविका के मुख्य आधार की तरह देख सकें। सच तो यह है कि अगर एक औसत किसान परिवार के पास आय के अन्य साधन न हों तो वह जीवन निर्वाह भी नहीं कर सकता। खेती की इस त्रासदी का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत में एक औसत किसान की दैनिक आय 35 से 50 रुपये के बीच बैठती है। यह हमारे राज्य और शासन-प्रतिष्ठान की बुनियादी सोच का खोट है कि उसकी स्वतंत्रता से लेकर आज तक की तमाम योजनाओं में खेती को उद्योग के मुकाबले हमेशा हीन और कम महत्व का माना गया, जबकि सच्चाई यह है कि बीस सालों से बाजार के असीमित विस्तार और उसे असंख्य रियायत दिए जाने के बावजूद आज भी देश का 52 प्रतिशत कार्य बल खेती और उससे जुड़े उत्पादक कार्यो से जीविका अर्जित करता है। और खेती आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा गुणक बना हुआ है। बहरहाल, अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में हुई वृद्धि से लाभांश कमाकर रियल एस्टेट लॉबी तथा छोटे-बडे़ व्यावसायिक घराने अब जमीन में निवेश कर रहे हंै। एक वर्ग के रूप में उनके पास इतना अकूत धन, संपर्क और संसाधन हंै कि वे जब चाहें और जहां चाहें जमीन खरीद सकते हैं। इस प्रक्ति्रया का आपत्तिजनक पहलू यह है कि इसमें अब सरकार भी सहयोगी या लाभकर्ता के तौर पर शामिल हो गई है। पिछले कुछ सालों में यह प्रक्ति्रया भयावह रूप से तेज हुई है। पहले सरकार आमतौर पर सार्वजनिक कार्यो के लिए जमीन का अधिग्रहण किया करती थी। तब भी किसानों को दी जाने वाली मुआवजे की राशि निरंकुश ढंग से निर्धारित की जाती थी, लेकिन उदारीकरण के बाद सरकार किसानों से जमीन लेकर खुद ही व्यावसायिक घरानों को बेचने लगी है। दुखद यह है कि ऐसा करते हुए हमेशा वृद्धि और विकास की दुहाई दी जाती है। खेतिहर जमीन पर लगातार बढ़ते इस संकट का आकलन करते हुए अक्सर उसके सामाजिक निहितार्थो की अनदेखी तो की ही जाती है, साथ ही भू-स्वामित्व के अन्य रूपों के महत्व पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। गौर करें कि किसानों की निजी भूमि के अलावा देश के हर क्षेत्र की कुल जमीन का एक निश्चित भाग ऐसा होता है, जिसे उस क्षेत्र विशेष की सामुदायिक संपदा माना जाता है। मसलन, चारागाह भूमि को लिया जा सकता है। यह एक ऐसी सामूहिक संपदा होती है, जिसके उपयोग और रखरखाव की जिम्मेदारी स्थानीय समुदाय की होती है, लेकिन खेती पर आधारित अर्थव्यवस्था के बिखराव तथा पशु-संपदा में आई गिरावट के साथ अब इस तरह की जमीन पर स्थानीय दबंगों, राजनीतिक रूप से ताकतवर गुटों का कब्जा होता जा रहा है। केंद्र सरकार से लेकर पंचायतों तक के पास इस तरह की सामूहिक संपदा के सामाजिक उपयोग को लेकर कोई नीति ही नहीं है। लिहाजा, वह एक ऐसी सहज उपलब्ध संपत्ति बन गई है, जिस पर कोई भी ताकतवर समूह अधिकार कर सकता है। इस तथ्य पर अलग से ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि निजी भूमि के अलावा, सामूहिक प्राकृतिक संसाधनों जैसे गांव-समाज की साझा भूमि, नदी, वन क्षेत्र आदि स्वतंत्रता के बाद से ही सरकारीकरण का शिकार होते गए हैं। यानी जिन संसाधनों पर पारंपरिक रूप से समुदायों का स्वामित्व माना जाता था, उन पर भी सरकार काबिज होती गई है। इसका एक गंभीर परिणाम यह हुआ कि स्थानीय समाज अपने संसाधनों के रखरखाव के प्रति उदासीन होता चला गया। उदाहरण के लिए दक्षिण भारतीय राज्यों आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के पठारी क्षेत्रों में जलाशय खेती के लिए सिंचाई का प्रमुख साधन होते थे। जलाशयों की सफाई और मरम्मत तथा पानी की प्रति परिवार उपलब्धता जैसे कार्य स्थानीय समिति के हाथों में रहते थे। अचरज की बात यह है कि यह व्यवस्था औपनिवेशिक शासन में तो फिर भी काम करती रही, लेकिन स्वतंत्रता के बाद जैसे-जैसे राज्य विकास का मुख्य प्रबंधक बनता चला गया, वैसे-वैसे लोग अपनी इस व्यवस्था से कटते चले गए। अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि जब सत्ता और निर्णय-प्रक्रिया केंद्रीकृत होने लगती है तो स्थानीय समाज का संचित ज्ञान और कौशल भी बिखरने लगता है। इस तरह जमीन के अधिग्रहण और उस पर कब्जा जमाने की इस प्रक्ति्रया का एक छोर जहां नागरिकों के सायास अशक्तिकरण से जुड़ा है तो दूसरा छोर शासन-व्यवस्था के कॉरपोरेटीकरण से। विकास के मौजूदा तर्क को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि अब सरकार को जनता के बजाए कॉरपोरेट समूहों की चिंता ज्यादा है, जबकि विकास और औद्योगीकरण के जरिए समाज को समृद्ध बनाने के इस छद्म में इन नागरिकों के लिए जमीन मुद्रा की तरह महज एक साधन भर है। अस्थाई लाभ के इस गणित में दूरगामी महत्व का यह तथ्य भुला दिया गया है कि वास्तव में भूमि एक वृहत्तर पारिस्थितिक तंत्र का अपरिहार्य अंग होती है। उसे एकांगी इकाई के रूप में बरतने का मतलब पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य आदि जैसे जीवन के बुनियादों उपादानों को हमेशा के लिए नष्ट करना होता है। खेतिहर जमीन के व्यावसायीकरण का यह बढ़ता खतरा इसलिए और गंभीर होता जा रहा है, क्योंकि हमारी शासन-व्यवस्था में सामुदायिक संस्थाओं का प्रभाव लगभग खत्म हो गया है। कहना न होगा कि एक छोटे से समूह की लिप्सा और उससे सरकार की सहमति को देखते हुए अब यह वृहत्तर समाज और उसकी नागरिक संस्थाओं को ही तय करना होगा कि वे किस तरह का विकास चाहते हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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