बुंदेलखंड आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक- भाषायी समानता वाला एक अलग व स्वतंत्र भौगोलिक प्रक्षेत्र है, जो आजादी के 63 साल बाद भी उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के बीच अप्राकृतिक व अवैज्ञानिक रूप से बंटा अब तक विकास की बाट जोह रहा है, जबकि देश के ज्यादा हिस्से विकास की राह पर काफी आगे बढ़ गए हैं । इसी कारण बुंदेलखंड आज देश के सबसे गरीब व पिछड़े क्षेत्र के रूप मे जाना-पहचाना जाता है, जबकि प्राकृतिक, वन व खनिज सम्पदा तथा पर्यटन स्थलों की दृष्टि से बुंदेलखंड अत्यधिक समृद्ध है। इनका उपयोग करके बुंदेलखंड को बहुत अधिक विकसित किया जा सकता है । बुंदेलखंड का इतिहास, संस्कृति, सामाजिक रीति रिवाजों/ परम्पराओं और बोली में समानता है और लोगों में अपनेपन तथा भावनात्मक एकता की भावना का होना बुंदेलखंड क्षेत्र की विशेषता है। इस पृष्ठिभूमि में बुंदेलखंड के पिछड़ेपन के कारणों व उपायों के सम्बंध मे गम्भीरतापूर्वक विचार करना बहुत आवश्यक हो गया है । बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश के झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, महोबा, चित्रकूट जिले, मध्य प्रदेश का दतिया, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, सागर, दमोह, कटनी जनपद, सतना जिले का चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र, गुना का चंदेरी विधानसभा क्षेत्र, शिवपुरी का पिछोर विधानसभा क्षेत्र, भिंड का लहर विधानसभा क्षेत्र, नरसिंहपुर जिले की गाडरवाला तहसील, विदिशा तथा सांची, गंज बासौदा क्षेत्र आता है। यह एक निर्विवाद सत्य है कि बुंदेलखंड का विकास तभी सम्भव हो सकता है, जब पूरी ईमानदारी तथा निष्ठापूर्वक इस क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं की पहचान करके उनका समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाय। यह तभी सम्भव हो सकता है, जब उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश से अलग करके बुंदेलखंड राज्य गठित किया जाए और इस ‘नये राज्य की धरती’ पर बैठकर और इस क्षेत्र की समस्याओं की पहचान कर उनके समाधान की योजना बने और उसे बुंदेलखंड के लोगों द्वारा ही सम्पादित किया जाय। तभी इस क्षेत्र के विपुल संसाधनों का उपयोग करके बुंदेलखंड के लोगों का कल्याण करना सम्भव हो सकेगा। अभी तक भिन्न आर्थिक-सामाजिक-भौगोलिक परिवेश(लखनऊ-भोपाल) से बुंदेलखंडवासियों के लिए योजना विरचन तथा कार्यान्वयन सम्बंधी कार्य सम्पादित किये जा रहे हैं। इसी दोषपूर्ण कार्य पद्धति के कारण ही आजादी के 63 वर्ष तक बुंदेलखंड पिछड़ा ही बना हुआ है और जन अपेक्षाएं निरंतर उपेक्षित हो रही हैं। अतएव बुंदेलखंड की वर्तमान स्थिति को आगे भी अनंतकाल तक बनाये रखना औचित्यपूर्ण नहीं प्रतीत होता है और न ही इस क्षेत्र की जनता ही यह बर्दास्त करेगी । इन बातों के परिप्रेक्ष्य में ही कदाचित बुंदेलखंड आज दोनों राज्यों की के साथ केंद्र सरकार के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बन गया है, जो एक दूसरे से आगे बढ़कर बुंदेलखंड के विकास की बातें कर रही हैं और इसके लिए काफी धनराशियां भी आबंटित कर रही हैं, पर दूरस्थ पण्राली द्वारा संचालित होने के कारण इन विकासपरक प्रयासों का लाभ न तो बुंदेलखंड को मिल पा रहा है और न ही बुंदेलखंड की धरती पर इसका कोई सकारात्मक प्रभाव ही परिलक्षित हो रहा है। देश में बुंदेलखंड की ही भांति ही उपेक्षित और पिछड़े क्षेत्रों को अलग करके उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि राज्य बनाये गए हैं जिसके अत्यधिक सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। नये राज्यों के बनने के बाद वहां के निवासियों मे अदम्य उत्साह का संचरण हुआ है। इन राज्यों का विकास कई-कई गुना बढ़ गया है और वे अपने पुराने पैत्रिक प्रांत को विकास की दौड़में काफी पीछे छोड़कर काफी आगे बढ़ गए हैं। इसका मुख्य कारण अपने राज्य की धरती पर बैठ कर वास्तविक जरूरतों और समस्याओं की पहचान कर सम्यक योजना का विरचन एवं कार्यान्वयन द्वारा अपना विकास करना रहा है। अलग राज्य बनने के पश्चात इन राज्यों के निवासियों में निजता और आत्मनिर्णय का भाव पैदा हुआ है और सभी मिलकर अपने-अपने प्रदेशों को तेजी के साथ आगे बढ़ने की ओर चल पड़े हैं। बुंदेलखंड की एक विशेष बात यह भी है कि इसका भूभाग उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश दोनों राज्यों के अंतर्गत आता है। अतएव दोनों प्रदेशों द्वारा समान समस्याओं के संदर्भ में समान, समन्वित व एकीकृत प्रयास नहीं हो पाता है। इसके अलावा यह भी ध्रुव सत्य है कि अनेक कारणों से दोनों प्रांत सरकारें यह नहीं चाहतीं कि उनका कोई अंश उनसे अलग हो। यह भी सही है कि वन व खनिज सम्पदा की दृष्टि से मध्य प्रदेश स्थित बुंदेलखंड अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध है। बुंदेलखंड की धरती पर कार्य करते हुए प्राप्त अपने अनुभवों में नि:सृत जानकारी के आधार पर मेरा मत है कि अलग बुंदेलखंड राज्य बनाने में देर नहीं की जानी चाहिए। बुंदेलखंड के बृहत्तर एकीकरण के फलस्वरूप सम्पूर्ण क्षेत्र का सही मायने में विकास सम्भव हो सकेगा और संसाधनों की कमी बाधक नहीं साबित होगी। तब हम देखेंगे कि देश के अन्य नव सृजित प्रदेशों की भांति बुंदेलखंड के लोग भी हीन भावना से उबरकर स्वाभिमान और निजता के भाव से अपना व क्षेत्र का विकास कर सकेंगे। बुंदेलखंड के अलग प्रांत की मांग करने वाले कई संगठन/संस्थाएं उसके लिए कार्य कर रही हैं, उनके प्रयासों में एकरूपता, समन्वय और परस्पर सहयोग का अभाव देखने में आ रहा है। इसलिए यह भी आवश्यक लगता है कि इस दिशा में क्रियाशील समस्त संगठन/संस्थाओं/ व्यक्तियों को चाहिए कि वे अपने-अपने को तिलांजलि देकर समन्वित, एकीकृत एवं सहयोगात्मक प्रयास करें। तभी इस वृहत्तर लक्ष्य को शीघ्रतापूर्वक प्राप्त करना सम्भव हो सकता है और यही बुंदेलखंड के हित में भी होगा। (लेखक उप्र के पूर्व गृह सचिव हैं)
Thursday, February 24, 2011
बुंदेलखंड राज्य का औचित्य
बुंदेलखंड आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक- भाषायी समानता वाला एक अलग व स्वतंत्र भौगोलिक प्रक्षेत्र है, जो आजादी के 63 साल बाद भी उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के बीच अप्राकृतिक व अवैज्ञानिक रूप से बंटा अब तक विकास की बाट जोह रहा है, जबकि देश के ज्यादा हिस्से विकास की राह पर काफी आगे बढ़ गए हैं । इसी कारण बुंदेलखंड आज देश के सबसे गरीब व पिछड़े क्षेत्र के रूप मे जाना-पहचाना जाता है, जबकि प्राकृतिक, वन व खनिज सम्पदा तथा पर्यटन स्थलों की दृष्टि से बुंदेलखंड अत्यधिक समृद्ध है। इनका उपयोग करके बुंदेलखंड को बहुत अधिक विकसित किया जा सकता है । बुंदेलखंड का इतिहास, संस्कृति, सामाजिक रीति रिवाजों/ परम्पराओं और बोली में समानता है और लोगों में अपनेपन तथा भावनात्मक एकता की भावना का होना बुंदेलखंड क्षेत्र की विशेषता है। इस पृष्ठिभूमि में बुंदेलखंड के पिछड़ेपन के कारणों व उपायों के सम्बंध मे गम्भीरतापूर्वक विचार करना बहुत आवश्यक हो गया है । बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश के झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा, महोबा, चित्रकूट जिले, मध्य प्रदेश का दतिया, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, सागर, दमोह, कटनी जनपद, सतना जिले का चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र, गुना का चंदेरी विधानसभा क्षेत्र, शिवपुरी का पिछोर विधानसभा क्षेत्र, भिंड का लहर विधानसभा क्षेत्र, नरसिंहपुर जिले की गाडरवाला तहसील, विदिशा तथा सांची, गंज बासौदा क्षेत्र आता है। यह एक निर्विवाद सत्य है कि बुंदेलखंड का विकास तभी सम्भव हो सकता है, जब पूरी ईमानदारी तथा निष्ठापूर्वक इस क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं की पहचान करके उनका समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाय। यह तभी सम्भव हो सकता है, जब उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश से अलग करके बुंदेलखंड राज्य गठित किया जाए और इस ‘नये राज्य की धरती’ पर बैठकर और इस क्षेत्र की समस्याओं की पहचान कर उनके समाधान की योजना बने और उसे बुंदेलखंड के लोगों द्वारा ही सम्पादित किया जाय। तभी इस क्षेत्र के विपुल संसाधनों का उपयोग करके बुंदेलखंड के लोगों का कल्याण करना सम्भव हो सकेगा। अभी तक भिन्न आर्थिक-सामाजिक-भौगोलिक परिवेश(लखनऊ-भोपाल) से बुंदेलखंडवासियों के लिए योजना विरचन तथा कार्यान्वयन सम्बंधी कार्य सम्पादित किये जा रहे हैं। इसी दोषपूर्ण कार्य पद्धति के कारण ही आजादी के 63 वर्ष तक बुंदेलखंड पिछड़ा ही बना हुआ है और जन अपेक्षाएं निरंतर उपेक्षित हो रही हैं। अतएव बुंदेलखंड की वर्तमान स्थिति को आगे भी अनंतकाल तक बनाये रखना औचित्यपूर्ण नहीं प्रतीत होता है और न ही इस क्षेत्र की जनता ही यह बर्दास्त करेगी । इन बातों के परिप्रेक्ष्य में ही कदाचित बुंदेलखंड आज दोनों राज्यों की के साथ केंद्र सरकार के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बन गया है, जो एक दूसरे से आगे बढ़कर बुंदेलखंड के विकास की बातें कर रही हैं और इसके लिए काफी धनराशियां भी आबंटित कर रही हैं, पर दूरस्थ पण्राली द्वारा संचालित होने के कारण इन विकासपरक प्रयासों का लाभ न तो बुंदेलखंड को मिल पा रहा है और न ही बुंदेलखंड की धरती पर इसका कोई सकारात्मक प्रभाव ही परिलक्षित हो रहा है। देश में बुंदेलखंड की ही भांति ही उपेक्षित और पिछड़े क्षेत्रों को अलग करके उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि राज्य बनाये गए हैं जिसके अत्यधिक सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। नये राज्यों के बनने के बाद वहां के निवासियों मे अदम्य उत्साह का संचरण हुआ है। इन राज्यों का विकास कई-कई गुना बढ़ गया है और वे अपने पुराने पैत्रिक प्रांत को विकास की दौड़में काफी पीछे छोड़कर काफी आगे बढ़ गए हैं। इसका मुख्य कारण अपने राज्य की धरती पर बैठ कर वास्तविक जरूरतों और समस्याओं की पहचान कर सम्यक योजना का विरचन एवं कार्यान्वयन द्वारा अपना विकास करना रहा है। अलग राज्य बनने के पश्चात इन राज्यों के निवासियों में निजता और आत्मनिर्णय का भाव पैदा हुआ है और सभी मिलकर अपने-अपने प्रदेशों को तेजी के साथ आगे बढ़ने की ओर चल पड़े हैं। बुंदेलखंड की एक विशेष बात यह भी है कि इसका भूभाग उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश दोनों राज्यों के अंतर्गत आता है। अतएव दोनों प्रदेशों द्वारा समान समस्याओं के संदर्भ में समान, समन्वित व एकीकृत प्रयास नहीं हो पाता है। इसके अलावा यह भी ध्रुव सत्य है कि अनेक कारणों से दोनों प्रांत सरकारें यह नहीं चाहतीं कि उनका कोई अंश उनसे अलग हो। यह भी सही है कि वन व खनिज सम्पदा की दृष्टि से मध्य प्रदेश स्थित बुंदेलखंड अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध है। बुंदेलखंड की धरती पर कार्य करते हुए प्राप्त अपने अनुभवों में नि:सृत जानकारी के आधार पर मेरा मत है कि अलग बुंदेलखंड राज्य बनाने में देर नहीं की जानी चाहिए। बुंदेलखंड के बृहत्तर एकीकरण के फलस्वरूप सम्पूर्ण क्षेत्र का सही मायने में विकास सम्भव हो सकेगा और संसाधनों की कमी बाधक नहीं साबित होगी। तब हम देखेंगे कि देश के अन्य नव सृजित प्रदेशों की भांति बुंदेलखंड के लोग भी हीन भावना से उबरकर स्वाभिमान और निजता के भाव से अपना व क्षेत्र का विकास कर सकेंगे। बुंदेलखंड के अलग प्रांत की मांग करने वाले कई संगठन/संस्थाएं उसके लिए कार्य कर रही हैं, उनके प्रयासों में एकरूपता, समन्वय और परस्पर सहयोग का अभाव देखने में आ रहा है। इसलिए यह भी आवश्यक लगता है कि इस दिशा में क्रियाशील समस्त संगठन/संस्थाओं/ व्यक्तियों को चाहिए कि वे अपने-अपने को तिलांजलि देकर समन्वित, एकीकृत एवं सहयोगात्मक प्रयास करें। तभी इस वृहत्तर लक्ष्य को शीघ्रतापूर्वक प्राप्त करना सम्भव हो सकता है और यही बुंदेलखंड के हित में भी होगा। (लेखक उप्र के पूर्व गृह सचिव हैं)
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