Friday, February 4, 2011

विदर्भ की राह पर तिरुपुर के कामगार


राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2009 में सत्रह हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की जो पिछले छह सालों में रिकार्ड है। आर्थिक विपन्नता और कर्ज तले दबे रहने के कारण 1997 से लेकर 2009 तक दो लाख से भी अधिक किसानों ने आत्महत्या का रास्ता चुना। इसी कालाविध में आत्महत्या के कारण देश के नक्शे के भीतर कुछ भौगोलिक क्षेत्रों की नई पहचान निर्मिंत हुई है। जैसे विदर्भ मतलब किसान आत्महत्या। हालांकि, इस तस्वीर की निर्मिति में समय लगा है। विदर्भ में किसान आत्महत्या जब राष्ट्रीय सुर्खियों में आई, उससे पहले हजारों किसान अपनी जान गवां चुके थे। कुछ प्रतिबद्ध पत्रकारों और कुछ ऐसी खबरों को सनसनी की तरह बेचने वालों ने जिस समय इसे तवज्जो दी, उस समय यह तथ्य भी जाहिर हुआ था कि खेती-किसानी की रिपोर्टंिग में लगे पत्रकारों की संख्या बेहद न्यून है, जबकि फैशन परेड को कवर करने के लिए सैकड़ों पत्रकार हाजिर होते हैं। आत्महत्यामूलक बहस में किसान आत्महत्या इतने वजन के साथ मौजूद है कि दूसरी इकाइयों में हो रही आत्महत्याओं पर ज्यादा बात नहीं हो पा रही। और इसे खास क्षेत्र की विशेष परिघटना के तौर पर देखे जाने का आग्रह निहित रहता है। मसलन बहुधा सुनने को मिलता है कि बिहार के किसान अधिक गरीब हैं लेकिन वे विदर्भ के किसानों के मुकाबले अधिक जीवट और साहसी होते हैं इसलिए आत्महत्या नहीं करते। छिपी बात यह है कि विदर्भ के किसान कमजोर होते हैं। इसे प्रमुख कारण के तौर पर स्थापित कर देने से मूल कारण छुपा रह जाता है। ऐसा एहसास दिलाया जाता है कि सुसाइड बेल्टके किसी किसान का आत्महत्या करना आम है।सुसाइड बेल्ट
बनने के कारणों पर र्चचा नहीं होती आर इसके अभाव में इस तरह के नए-नए बेल्ट बनते रहते हैं। किसान आत्महत्या के भयावह आंकड़ों के साथ अभी जो ताजा चिंताजनक तथ्य सामने आ रहा है, वह यह कि दक्षिण भारत के मैनचेस्टर कहे जाने वाले कोयंबटूर से सटे तिरुपुर जिले में पिछले दो सालों में एक हजार से अधिक वस्त्र-मजदूर आत्महत्या कर चुके हैं। तिरु पुर देश के बुने हुए सूती कपड़ों का लगभग 90 प्रतिशत निर्यात करता है। बीते साल की पहली छमाही में यहां 350 से अधिक मजदूर आत्महत्या कर चुके थे और जून से अगस्त के बीच लगभग 250। अगस्त में ही 103 लोगों ने अपनी जान दी। वहां प्रतिदिन औसतन पांच-दस लोग या तो आत्महत्या कर रहे हैं या करने की कोशिश कर रहे हैं। इसी के चलते जिला प्रशासन को यहां आत्महत्या निरोधक क्लीनिक बनाना पड़ा है, जहां आत्महत्या की कोशिश करने वाले मरीजों का इलाज होता है। आत्महत्या के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए तिरुपुर मॉडल है। यह तमिलनाडु का वह शहर है जहां पिछले दशक में विकास के सारे लोकप्रियप्रतिमानों का खूब विस्तार हुआ है। यहां कपड़े का व्यवसाय 2008 के 80 करोड़ रुपए के मुकाबले 2009 में बढ़कर 120 करोड़ हो गया। एक स्थानीय कपास कंपनी ने स्विटजरलैंड की एक बीटी-शर्ट कंपनी का नियंतण्रअधिकार हासिल कर लिया। यहां से वालमार्ट, टॉमी, रिबॉक, डिजल, स्विचर जैसी दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां सौदा करती हैं लेकिन यहां के अधिकांश मजदूर सस्ता जहर और रसायन खाकर मर रहे हैं। आम तौर पर चूहे मारने की दवा और गाय के गोबर के पाउडर सरीखा कोई रसायन खाकर लोग आत्महत्या कर रहे हैं। बारह घंटे काम करने के बाद मजदूरों को दो सौ रुपए प्रतिदिन मिलता है। देश के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी श्रम कानून नहीं अपनाया जाता और ओवरटाइम की व्यवस्था को मालिक अपनी सुविधा से तय करते हैं। अपने अधिकारों के लिए मजदूरों को एकजुट होने से न सिर्फ कंपनी मालिक रोकते हैं बल्कि जिला प्रशासन का प्रच्छन्न प्रोत्साहन भी उन्हें रहता है। जिला प्रशासन और राज्य की भूमिका समझने के लिए एक मिसाल ले सकते हैं। र्वल्ड सोशलिस्ट वेबसाइट के अनुसार जिस दिन उनके रिपोर्टर शहर में गए, उस दिन हजारों पुलिस वाले यह कहते हुए घर-घर तलाशी ले रहे थे कि कोई माओवादी वहां छुपा है। लेकिन वेबसाइट का दावा है कि पुलिस का असली मकसद कामगारों द्वारा नियोजित अगले दिन के प्रदशर्न को कमजोर करना और उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए भयभीत करना था। पुलिस महकमा हर चीज को अलग- अलग करके देखने के पक्ष में है। मजदूर समस्या और मजदूर आत्महत्या को भी अलग-अलग कर देखने का उसका आग्रह है। लेकिन घटनाओं को अलग करके विश्लेषण करने में सिर्फ अपनी सुविधाजनक स्थिति को हासिल करना निहित राजनीति है। मसलन, छत्तीसगढ़ में भी राज्य कहता है कि आदिवासी समस्या और माओवाद अलग करके देखा जाना चाहिए लेकिन माओवाद को राज्य के लिए बड़ा खतरा बताते हुए किसी मानवाधिकार कार्यकर्ता को बिना ठोस सबूत के गिरफ्तार कर लेना अलग चीज के दायरे में नहीं आता। माओवाद बड़ा खतरा है इसलिए किसी के नाम के साथ इसका टैग लगाकर गिरफ्तार किया जा सकता है। तिरु पुर में आत्महत्या के आंकड़े हद से ज्यादा बढ़ जाने के बाद इसकी जांच-पड़ताल के लिए जिस समिति का गठन किया गया है उसमें डॉक्टर, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता से लेकर व्यवसायी और सरकारी नुमाइंदे तक शामिल हैं लेकिन आश्र्चयजनक तौर पर इसमें मजदूर कार्यकर्ता शामिल नहीं हैं। मजदूरों की समस्या पर बात रखने का अधिकार मजदूर को नहीं दिया जा रहा है। उनके अधिकार और जीवन जीने की न्यूनतम शर्तों को दबाया जा रहा है। तिरु पुर में एक मजदूर का फैक्ट्री में काम के दौरान हाथ कटने के बाद उसे न सिर्फ इलाज के लिए पैसा देने से कंपनी मुकर गई बल्कि काम से भी निकाल दिया गया। पिछले दो सालों में लगभग 25000 मजदूरों को काम से निकाला गया है और तीव्र शहरीकरण से उपजी स्थिति में वे अपनी जीविका के लिए भीषण जद्दोजेहद से गुजर रहे हैं। धीरे-धीरे डॉलर सिटी, कॉटन सिटी, निट सिटी जैसी उपाधियों से हटकर तिरुपुर अब तमिलनाडु की आत्महत्या राजधानी के तौर पर विकसित हो रही है। विदर्भ की ही तरह हजारों लोगों के मरने के बाद यह मीडिया का विषय बनेगी।


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