Sunday, January 30, 2011

आंगनबाड़ी पर भी महंगाई की मार


सरकारी योजनाओं पर भी महंगाई की मार पड़ने लगी है। आंगनबाड़ी में बच्चों को पूरक पोषाहार के लिए दिए जाने वाली चार से छह रुपये प्रतिदिन की राशि अब कम पड़ने लगी है और कई राज्यों ने हाथ खड़े करते हुए केंद्र से इस राशि को कम से कम दोगुना करने की मांग की है। इसके अलावा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय को बढ़ाने की भी मांग जोरदारी से उठी है। समेकित बाल विकास योजना को मजबूत करने के लिए केंद्र ने राज्यों से परियोजना क्रियान्वयन प्लान 20 फरवरी तक भेजने को कहा है, ताकि इस पर काम शुरू किया जा सके। विभिन्न राज्यों के महिला व बाल विकास मंत्रियों के सम्मेलन में महंगाई का रोना रोया गया और धन की समस्या को लेकर केंद्र व राज्यों के बीच मतभेद भी उभरे। ऐसे में प्रधानमंत्री के विशेष जोर वाली समेकित बाल विकास योजना के तेजी से क्रियान्वयन पर सवाल भी खड़े हुए। बच्चों को पूरक पोषाहार के लिए दिए जाने वाले 4 से 6 रुपये प्रतिदिन के प्रावधान पर सवाल उठे और राज्यों ने कहा कि इस महंगाई के दौर में इस राशि में यह कर पाना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश ने तो इसे बढ़ाकर आठ रुपए करने का सुझाव भी दिया। केंद्र ने इसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जोड़ने की बात कही। इसी तरह आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दिए जाने वाले मानदेय को बढ़ाकर पांच हजार करने की भी मांग की गई। अभी यह ढाई से तीन हजार के बीच है और इसमें केंद्रीय सहायता 1500 रुपये माहवार है। बैठक के बाद केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कृष्णा तीरथ ने कहा कि बैठक समेकित बाल विकास योजना को नए सिरे से मजबूत करने के लिए सबला, मातृत्व सहयोग योजना, आंगनबाड़ी में प्री-स्कूल योजना, समेत तमाम मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई। आंगनबाड़ी को पक्का करने के लिए मंत्रालय ने सांसदों, विधायकों, पार्षदों व जिला पंचायतों व पंचायतों से मदद मांगी है ताकि पक्के भवन बनने के बाद इस बारे में कार्यक्रमों को लागू किया जा सके। बैठक में लगातार गायब हो रहे बच्चों का भी सवाल उठा। इसके लिए पश्चिम बंगाल में पायलट आधार पर चल रही ट्रेकिंग व्यवस्था को सभी राज्यों में लागू करने की बात कही गई।


होमगार्ड बनने की कतार में बीटेक-एमबीए वाले


भगतपुर में रहने वाले प्रदीप सिंह एमबीए कर चुके हैं, लेकिन दो साल से खाली बैठे हैं। उन्हें नौकरी मिली थी, लेकिन टारगेट पूरा न कर पाने के कारण चली गई। अब उनकी उम्मीदें होमगार्ड के लिए हो रही भर्ती पर टिक गई हैं। उनकी ही तरह होमगार्ड बनने की आस संभल के हल्लू सराय निवासी दीपक गौड़ भी लगाए हुए हैं, जो बीटेक की डिग्री की लैस हैं। कुछ ऐसी ही कहानी असमोली ब्लाक के शेखर कुमार की है। उन्होंने दो साल पहले हिंदू कालेज से एमएससी किया था। जगह-जगह से मिली नाउम्मीदी के बाद उन्हें उम्मीद है कि वह होमगार्ड बन सकते हैं। सभी बेरोजगार युवा इससे वाकिफ हैं कि होमगार्ड के रूप में उन्हें सिपाहियों के सेवक की तरह काम करना पड़ा सकता है, लेकिन फिलहाल उन्हें इसकी परवाह नहीं। शैक्षिक योग्यता से कमतर काम करने के लिए विवश इन युवाओं के अनुसार बेरोजगारी से जुड़ी इस समस्या का समाधान करना तो दूर रहा, कोई इस बारे में सोचने के लिए भी तैयार नहीं। पुलिस अस्पताल ग्राउंड में 292 होमगार्ड की भर्ती के लिए जारी प्रक्रिया में 2800 आवेदन आए हैं। इनमें से 1400 को चयन प्रक्रिया में शामिल होने की हरी झंडी मिल चुकी है। इन 1400 में शुरुआती परीक्षण के बाद छांटे गए युवाओं में डेढ़ सौ से ज्यादा ऐसे हैं जो इंजीनियरिंग या प्रोफेशनल डिग्री लिए हैं अथवा पोस्ट ग्रेजुएशन किए हुए हैं। होमगार्ड बनने के लिए सिर्फ हाईस्कूल पास होना ही काफी है। वर्तमान में होमगार्ड को महज डेढ़ सौ रुपये दैनिक वेतन मिलता है।


आत्महत्या के पीछे कारण


हाल में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर चार मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है और ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानी हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा आप अपनी जान ले ले रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या करने वालों में 34.5 प्रतिशत की उम्र 15 से 29 साल के बीच है। हर रोज, कितने युवा अपने सपनों को हकीकत में बदल पाने के गम में जीवन से पलायन का रास्ता अपना रहे हैं। वह युवा अपने पीछे केवल गहरे जख्म बल्कि प्रश्नों की वह गुत्थी भी छोड़ जाते हैं, जिन्हें सुलझाना बेहद जरूरी है। भारत में लगातार बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। वि स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वि में आत्महत्या करने वालों में भारत दूसरे स्थान पर है। पिछले कुछ दशकों में भारतीय सामाजिक ढांचे में आए परिवर्तन के चलते भारतीय किशोरों के लिए आयु का यह संधिकाल बेहद कठिन बन गया है। अप्रत्याशित समृद्धि और वैीकरण के चलते, भारतीय युवाओं की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। कम समय में अधिक से अधिक पाने की चाह, सहनशीलता की कमी, गलाकाट प्रतियोगिता और निरन्तर बढ़ते दबाव से युवा अवसाद का शिकार हो रहे हैं। सफलता-असफलता के मध्य संघर्ष करता युवा, जीवन के बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा होता है और स्थिति तब और अधिक पीड़ादायक हो जाती है जब उसके कंधों पर अभिभावकों के स्वप्नों का भी दायित्व होता है। परिवार में केवल बच्चे का सर्वागीण विकास होता है बल्कि उसे जीवन जीने की चाह और संघर्ष से लड़ने का संबल भी मिलता है। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता तो वह बच्चा जो जीवन के पड़ावों से गुजरता हुआ किशोर और युवा बनता है, बिखर जाता है। संतान के जन्म के बाद से ही माता-पिता बच्चों के लिए स्वप्न का तिलिस्म बुनने लगते हैं, जिसमें वह कदर घिर जाता है कि चाह कर भी छुटकारा नहीं पा सकता। अभिभावकों की इच्छा युवाओं पर गहरा मानसिक भावनात्मक दबाव बनाता है। असफलता किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति को सहज स्वीकार्य नहीं होती। परन्तु यह स्थिति, किशोरावस्था युवावस्था में बेहद संवेदनशील होती है। जब किसी युवा को लगने लगता है कि वह अपने अभिभावकों के स्वप्न को साकार नहीं कर पाएगा तो उसे जीवन तुच्छ लगने लगता है। ऐसी वेदना कहीं कहीं उसे आत्महत्या के लिए विवश करती है। पिछले कुछ वर्षो में, सामाजिक संरचना के पारिवारिक ढांचे में आमूल चूल परिवर्तन आया है। भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह में माता-पिता दोनों कार्य कर रहे हैं। अपने ही दायरे और कॅरियर में व्यस्त, तेज गति का जीवन जीने वाले ऐसे माता-पिता के बच्चे एकाकीपन का शिकार हो रहे हैं। ऐसी पृष्ठभूमि में युवा असफलता और हताशा को पिछली पीढ़ी की तुलना में अधिक भावुकता से ले रहे हैं। शोध बताते हैं कि आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे एक कारण बच्चों को अधिकाधिक भौतिक सुख- सुविधाओं की उपलब्धता भी है। जिन बच्चों को आसानी से सब कुछ मिल जाता है उन्हें जीवन की हताशानि राशाओं का सामना करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मूलभूत तथ्य यह है कि यथार्थ और स्वप्न के मध्य धैर्य और सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है और इन सबसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है परिवार का साथ। अपनों द्वारा दिया गया विास, प्रेम और मार्गदर्शन ही बच्चों को तनाव से मुक्ति दिलाता है और यहीआत्महत्याको रोकने का एक मार्ग है।


Wednesday, January 26, 2011

भारत की महाशक्ति बनने की डगर


जब से अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने भारत की संसद में कहा कि भारत उभरती हुई नहीं, बल्कि उभर चुकी ताकत है तब से हर तरफ यह चर्चा छिड़ गई है कि भारत वाकई सुपर पावर है या फिर अपने निजी फायदों के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति हमें बरगला रहे हैं। भारत को सुपर पावर होने न होने को लेकर यह कोई पहली बार बहस नहीं शुरू हुई है। यह काफी उलझा हुआ और जटिल सवाल है कि भारत को सुपर पावर माना जाए या नहीं। इस जटिलता की वजह यह है कि भारत एक साथ तमाम तरह के विरोधाभासों से लैस है। मसलन एक तरफ जहां भारत की विशाल आबादी एक बड़ा संसाधन है वहीं यह तमाम बातों के लिए अभिशाप भी है। हम आबादी को संसाधन इसलिए मान सकते हैं, क्योंकि हमारी बहुत बड़ी आबादी न केवल नियंत्रण में हैं और हमारे पास उपलब्ध संसाधन इनका पेट भरने के लिए पर्याप्त हैं। हालांकि कुशल प्रबंधन के अभाव में ऐसा व्यवहार में नहीं दिख रहा। इसके अलावा हमारी राजनीतिक स्थिरता व सामाजिक एकता भी बड़ी वजह है। दुनिया में भारत के अलावा कोई ऐसा देश नहीं है तकरीबन 17 अधिकृत भाषाएं हों और 22 हजार बोलियां। इसके साथ ही दुनिया का कोई ऐसा प्रमुख धर्म नहीं है जिसके अनुयाई भारत में न रहते हों। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अगले 20 सालों में हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होंगे। भारत तेजी से एक बड़े मध्य वर्ग वाले देश के रूप में उभर रहा है। भारत में इस समय 30 अरब डॉलर से भी बड़ा लग्जरी सामानों का बाजार है और शायद ही दुनिया का कोई बड़ा ब्रांड हो जो भारत में अपने कारोबार को फोकस न करना चाहता हो। ओमेगा, रोलैक्स, टैग ह्यूवर, कार्टियर, टॉमी हिलफिगर, गुक्की, डोल्स और गब्बाना जैसे अंतरराष्ट्रीय बड़े ब्रांड आज भारत के महानगरों में ही नहीं छोटे-छोटे शहरों में भी मिल जाते हैं। लगभग 70 करोड़ मोबाइल धारकों की संख्या के लिहाज से हम चीन के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं। भारत छोटी कारों का हब है। दुनिया की 95 फीसदी बड़ी कारें अपने शोरूम भारत में खोल रही हैं और जल्द ही हम बड़ी कारों के भी दुनिया में सबसे बड़े ग्राहक होंगे। भारत कुशल श्रमिकों का सबसे बड़ा गढ़ है। विकसित देश भी भारत की तकनीकी कुशल श्रमशक्ति की बदौलत ही अपनी श्रेष्ठता और विकसित स्थिति को बचाए हुए हैं। आने वाले 20 वर्षो में भारत पूरी दुनिया में कुशल श्रमशक्ति का सबसे बड़ा निर्यातक देश साबित होगा। जितनी तेजी से हमने आइटी इंडस्ट्री में नाम कमाया है उसे देखते हुए भविष्य का तकनीकी ताज हमारे सिर बंधने की उम्मीद है। किसी देश की सुपर सत्ता तब तक नहीं अस्तित्व पाती है जब तक वह सैन्य मामले में भी ताकतवर न हो। यही कारण है कि दुनिया के कई देश जिन्होंने अपना आर्थिक विकास तो तेजी से किया मगर सैन्य विकास और ढांचे के मामले में बड़े नहीं बन पाए उनकी सुपर सत्ता हमेशा संदेहास्पद रही। हालांकि भारत के साथ ऐसा नहीं है। भारत सैन्य शक्ति के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे ताकतवर देश है। हम भले ही अभी सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य न बने हों, लेकिन सर्वस्वीकृत परमाणु शक्ति जरूर बन चुके हैं। इसके अलावा मिसाइल शस्त्रीकरण में भी भारत दुनिया के पहले पांच प्रमुख देशों में आता है। हमारे पास मिसाइलों की एक पूरी श्रृंखला है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह स्वदेशी तकनीक पर आधरित है और हम अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों के दर्जे में शामिल हैं। हाल के दिनों में हमारे लोकतंत्र की सभी प्रमुख दीवारों चाहे वह कार्यपालिका हो या न्यायपालिका अथवा चौथा खंभा मीडिया तक में गंदगी और भ्रष्टाचार की दीमक दिखी है। अब यह खतरा पैदा होता लग रहा है कि कहीं हम बनाना रिपब्लिक में न तब्दील हो जाएं, लेकिन मजबूत आधार यह है कि हम पिछले 64 सालों से निरंतर लोकतंत्र हैं और इस निरंतरता में हमें पूरा भरोसा है। किसी देश के ताकतवर होने का एक बड़ा सबूत यह होता है कि दुनिया में उसको कितना महत्व मिल रहा है? अगर पिछले एक दशक को देखें तो लगातार भारत को विश्व के राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण देश के रूप में मान्यता मिल रही है। इसका सबसे बड़ा पैमाना भारत में पिछले एक दशक में विश्व के बड़े राजनेताओं, शासनाध्यक्षों और राष्ट्रप्रमुखों की यात्राएं हैं। पिछले एक दशक में भारत में जितने प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष अथवा शासनाध्यक्ष आए हैं उतने और किसी देश में नहीं। यह महज शिष्टाचार यात्राएं भर नहीं थीं, बल्कि इनके बड़े आर्थिक और राजनीतिक लक्ष्य थे। गोल्डमैन एंड सैक्स के मुताबिक वर्ष 2050 तक भारतीयों की प्रति व्यक्ति आय तकरीबन 35 गुना बढ़ जाएगी और और भारतीय अर्थव्यवस्था जापानी अर्थव्यवस्था के मुकाबले 500 फीसदी बड़ी हो चुकी होगी। भारत की आर्थिक मजबूती हमारे लोगों के रहन-सहन में भी दिखता है। पिछले एक दशक में भारत में हवाई सफर करने वाले यात्रियों की संख्या में 400 फीसदी का इजाफा हुआ है और सालाना पर्यटन के लिए निकलने वाले लोगों की संख्या में 300 फीसदी इजाफा हुआ है। भारत जिस अंदाज में अपना आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी वर्चस्व कायम कर रहा है उससे किसी को शक नहीं है कि दुनिया क्यों उभरते हुए भारत को सलाम करना चाहती है? हालांकि भारत के साथ अभी भी तमाम ऐसी मूलभूत खामियां जुड़ी हुई हैं जो हमें एक कमजोर और लाचार देश साबित करती हैं। इतिहासकार और समाजशास्त्री रामचंद्र गुहा ऐसे 10 बिंदुओं की तरपफ हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं जो हमारे सुपर पावर बनने में बड़ी बाधा साबित हो सकते हैं। पहला यह कि आज भारत जबरदस्त आंतरिक सुरक्षाजन्य चुनौतियों से रू-ब-रू है। भ्रष्टाचार दिन पर दिन अपना मुंह सुरसा के बदन की तरह बढ़ रहा है। सार्वजनिक निकायों का क्षरण हो रहा है, गरीबों और अमीरों के बीच लगातार खाई चौड़ी हो रही है। लगातार पर्यावरण विनाश हो रहा है और भारत का चुनावी ढांचा जड़ता का शिकार है। सरहदों पर बेचैनी बढ़ रही है और हमारे पड़ोसी अस्थिरता के शिकार हो रहे हैं। मीडिया और न्यायपालिका की विश्वसनीयता कम हो रही है। यह वो लक्षण हैं जो हमारे गहराते मर्ज के लक्षणों को व्यक्त करते हैं। सवाल है भारत जैसी उभरती हुई ताकत को इन रोगों का निदान कैसे सकता है? यदि नौकरशाही, राजनीति और मीडिया को ईमानदार बना दें तो इनका इलाज संभव है। बुद्धिजीवी, पत्रकार, उद्योगपति और न्यायाधीश यदि कमर कस लें तो भारत न सिर्फ दुनिया का सबसे ताकतवर देश बन सकता है, बल्कि उसे महान देश बनने से भी कोई नहीं रोक सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)