यह आश्चर्य नहीं कि ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से करोड़पति बनी राहत तसलीम के पास बैंक खाता नहीं है। क्योंकि देश की 40 फीसदी आबादी के पास कोई बैंक खाता नहीं है। इसका बड़ा कारण बैंक शाखाओं का अभाव है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के मुताबिक, देश के छह लाख 50 हजार गांवों में से केवल 5.2 प्रतिशत गांवों मे ही बैंक की शाखाएं हैं। मौटे तौर पर गांवों में 20 फीसदी से भी कम लोगों के पास बैंक खाता है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि देश में करोड़ों लोगों के पास कोई बैंक खाता नहीं है। इस तरह यह तबका देश की वित्तीय व्यवस्था की परिधि से बाहर है।
भारत में व्यापक पैमाने पर लोगों का वित्तीय व्यवस्था से परे रहने का एक कारण बैंकों की उपलब्धता को लेकर राज्य स्तर पर असमानता भी है। एक ओर मणिपुर जैसा राज्य है, जहां प्रत्येक 33,000 व्यक्तियों पर एक बैंक शाखा है, तो दूसरी ओर गोवा भी है, जहां प्रत्येक चार हजार लोगों पर बैंक की एक शाखा है। वैसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक 15 हजार व्यक्तियों पर एक बैंक शाखा उपलब्ध है। इस मामले में हिंदीभाषी राज्यों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। अधिकतर राज्यों में बैंक शाखा की उपलब्धता का औसत राष्ट्रीय औसत से कम है। मणिपुर के बाद नगालैंड दूसरा राज्य है, जहां प्रति व्यक्ति बैंकों की उपलब्धता कम है। यहां प्रत्येक 26,000 व्यक्तियों पर एक बैंक शाखा उपलब्ध है। इसी तरह बिहार में प्रत्येक 25,000 नागरिकों पर, असम में प्रत्येक 22,000 व्यक्तियों पर, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश में प्रत्येक 20,000 व्यक्तियों पर एक बैंक शाखा उपलब्ध है। इसके बाद बाकी के बचे हुए राज्यों की स्थिति राष्ट्रीय औसत के बराबर है या उससे बेहतर है। वैसे उड़ीसा ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां प्रति व्यक्ति बैंक शाखा की उपलब्धता राष्ट्रीय औसत के बराबर है। महाराष्ट्र में प्रत्येक 14,000 व्यक्तियों पर एक बैंक शाखा उपलब्ध है। जम्मू-कश्मीर, मेघालय, गुजरात और अांध्र प्रदेश में प्रत्येक 13,000 लोगों पर और हरियाणा, मिजोरम, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादर और नागर हवेली और तमिलनाडु में प्रत्येक 11,000 व्यक्ति पर एक बैंक शाखा उपलब्ध है। दमन और दीव और कर्नाटक में प्रत्येक दस हजार व्यक्ति पर एक बैंक शाखा है, जबकि उत्तराखंड और पुडुचेरी में प्रत्येक नौ हजार पर, दिल्ली, पंजाब, सिक्कम और केरल में प्रत्येक आठ हजार पर और हिमाचल प्रदेश में प्रत्येक सात हजार व्यक्ति पर एक बैंक शाखा उपलब्ध है। लक्ष्यद्वीप में प्रत्येक छह हजार, चंडीगढ़ और गोवा में प्रत्येक चार हजार व्यक्तियों पर एक बैंक शाखा है।
स्पष्ट है कि बैंकों की उपलब्धता को लेकर देश में राज्य स्तर पर काफी असमानता है। इस दिशा में केंद्र को ध्यान देना चाहिए, ताकि अधिक लोगों को वित्तीय व्यवस्था की परिधि में शामिल किया जा सके। इससे जुड़ी दूसरी अहम बात यह है कि लेन-देन की प्रक्रिया में बैंकों की भूमिका बढ़ने से सरकार की भी आय बढ़ेगी। चूंकि देश के कोने-कोने में किसान अपना उत्पाद प्रत्येक दिन मंडी में बेचकर कुछ नकदी रकम प्राप्त करता है, पर इसमें बैकों की कोई भागीदारी नहीं होती। अगर इस आदान-प्रदान में बैंकों की भागीदारी हो, तो इससे देश को काफी फायदा होगा।
एक अनुमान के मुताबिक, देश की तमाम मंडियों में रोजाना औसतन 800 करोड़ रुपये का उत्पाद बिकता है। इस रकम को किसान अपने साथ नकद रूप में घर ले जाता है। अगर कृषि क्षेत्र का सभी लेन-देन बैंकों द्वारा हो तो देश के सकल घरेलू उत्पाद में दस लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हो सकती है, जो विर्निमाण क्षेत्र के बराबर है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी है कि देश के देहाती इलाकों में अधिक से अधिक बैंक शाखा खोलने की जरूरत है, ताकि देश के एक बड़े तबके को बैंकिग व्यवस्था का लाभ मिल सके। चूंकि देश के देहाती इलाकों में मौटे तौर पर 80 फीसदी लोगों के पास कोई बैंक खाता नहीं है, लिहाजा सरकार आने वाले पांच वर्षों के दौरान देश के ग्रामीण इलाकों में दस करोड़ नए लोगों का बैंक एकाउंट खोलने को प्रयासरत है। अगर देहाती इलाकों में बैंकिग व्यवस्था का विस्तार और क्रियान्वयन बेहतर तरीक से हो, तो देश के जीडीपी के बचत वाले हिस्से में चार से पांच फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। यानी कि 40 से 50 अरब डॉलर तक की बढ़ोतरी हो सकती है। देश के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए वित्तीय व्यवस्था की परिधि का विस्तार जरूरी है।
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