Friday, January 21, 2011

कब तक रामभरोसे रहेगा किसान


यहां मामला अमीरी-गरीबी का नहीं, नई खेती का है, जिसमें किसान भारी कर्ज लेकर खेती करता है।
वर्ष 2009 में 17,368 किसानों ने आत्महत्या की। यह अविश्वसनीय-सी लगने वाली जानकारी अपराध संबंधी राष्ट्रीय ब्यूरो की वार्षिक रिपोर्ट की है, जो एक साथ ढेर सारे सवाल उठाती है और काफी सारे लोगों को कठघरे में डालती है। यह सरकारी आंकड़ा है, जो वास्तविक संख्या से कम तो हो सकता है, ऊपर नहीं होगा। चिंता की बात यह है कि यह उस दौर का आंकड़ा है, जब हमारे राष्ट्रीय और राजनीतिक विमर्श से किसानों की आत्महत्या और खेती की बदहाली का सवाल गायब हो चुका है। उस पर धनात्मक या ऋणात्मक जैसी भी हो, आखिरी चर्चा तभी हुई थी, जब सरकार ने किसानों की कर्ज माफी का फैसला किया था। यह सरकार के चुनावी वायदे का हिस्सा था, क्योंकि यूपीए ने किसानों की आत्महत्या, खेती की बदहाली और आम आदमी की परेशानियों को मुद्दा बनाकर ही राजग को पटखनी दी थी। तब राजग अपनी कथित आर्थिक उपलब्धियों के आधार परइंडिया शाइनिंगके नारे के साथ चुनाव में उतरा था और इस नारे का मीडिया और शहराती लोगों पर अच्छा-खासा प्रभाव भी था। पर आर्थिक बदहाली और किसानों की आत्महत्या तक जाने की स्थिति की सचाई ने इंडिया शाइनिंग की हवा निकाल दी थी। पर उसके बाद से कांग्रेस तथा यूपीए को तो किसानों की कर्ज माफी की याद भी रही, विपक्ष किसानों की खोज-खबर लेने का काम भी भूल गया लगता है। इन्हीं आंकड़ों में यह दुखद सचाई भी सामने आती है कि कर्ज माफी हो या कृषि उत्पादों की कीमतों में ठीक-ठाक बढ़ोतरी, इन सबके बाद भी किसानों की आत्महत्या के क्रम में कोई कमी नहीं आई है। अगर 2009 में 17,368 किसानों ने आत्महत्या की, तो 2008 में लगभग 16,000 किसानों ने यही किया। खास बात यह है कि आत्महत्या वाले इलाके वही हैं, जो पहले भी थे। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे पांच राज्यों में ही दो-तिहाई आत्महत्याएं हुई हैं। केरल, तमिलनाडु, पंजाब का नंबर इसके बाद है, तो बिहार, झारखंड और उड़ीसा जैसे अपेक्षाकृत गरीब राज्यों में यहबीमारीकाफी कम है। असल में यह मामला अमीरी-गरीबी का होकर नए तरह की खेती का है, जिसमें नकदी फसलों के लोभ में किसान भारी कर्ज लेकर बीज, खाद, कीटनाशक ही नहीं, उधार पर जमीन लेकर खेती करता है। और प्राकृतिक या किसी भी कारण से अगर फसल गई, तो उस बेचारे के पास आत्महत्या करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहता। नई खेती जरूरी है, पर उसमें बीमा और न्यूनतम मूल्य जैसे भरोसेमंद बचाव की भी जरूरत है, वरना किसान के पास जरा भी ऊंच-नीच बर्दाश्त करने की शक्ति नहीं रह गई है।


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