गांधीजी ने कहा था कि देश खुशहाल तब होगा जब हमारे गांव खुशहाल होंगे, लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में आज हालत यह है कि समुन्नत अभियांत्रिकी और रचनात्मक चिंतन व सृजन के केंद्र गांव नहीं, बल्कि शहर हैं। कभी विश्व की सभ्यता के विकास की धुरी रहे गांव आज जाति-धर्म की संकीर्ण मानसिकता, ऊंच-नीच और अगड़े-पिछड़े की जकड़बंदी के साथ-साथ भूमि व रोजगार के अभाव के शिकार बने हुए हैं। गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन का नतीजा शहरों-महानगरों में आबादी का बढ़ता दबाव और शहरी जीवन से दूर पूरी तरह आत्मनिर्भर व विनिमय प्रणाली पर जीते गांवो का हर कहीं अभाव है। संयुक्त राष्ट्र की मानें तो इस दशक के आखिर तक दुनिया में 500 ऐसे शहर हो जाएंगे जिनकी आबादी 10 लाख अथवा उससे ज्यादा का आंकड़ा पार कर जाएगी और 2017 तक दिल्ली, मुंबई, ढाका, जकार्ता, लागोस, मेक्सिको सिटी, न्यूयार्क, साओपाउलो और टोकियो आदि महानगरों की आबादी बीस करोड़ से भी अधिक का आंकड़ा पार कर लेगी। यह अलग बात है कि 1950 में समूचे विश्व में न्यूयार्क और टोकियो ही इस श्रेणी में शामिल एकमात्र शहर थे। वर्ष 1800 में तो पूरी दुनिया की आबादी का महज तीन फीसदी हिस्सा ही शहरों में रहता था और गांव ही हमारे सभ्यता की महत्वपूर्ण धुरी हुआ करते थे। असलियत में आज बढ़ती आबादी के कारण कृषि योग्य जमीन की कमी होती जा रही है। इसके अलावा दबंग सवर्णो, पिछड़ी जातियों और भूसामंतों के बढ़ते शोषण और अत्याचार आज एक सच्चाई बन चुकी है। 16-18 घंटे जीतोड़ मेहनत के बावजूद दो जून की रोटी तक जुटा पाने में नाकाम रहने और कर्ज के जाल में जकड़ जाने के कारण विवशता में दबंगों की गुलामी कर रहे ग्रामीण अंतत: शहरों की ओर भागने अथवा पलायन को विवश हो रहे हैं। इसका एक सबसे बड़ा कारण भूख तो है ही, भय व आतंक से मुक्ति, बुनियादी सुविधाओं की कमी और स्वच्छंद रूप से जीने की अदम्य लालसा भी इसके लिए जिम्मेवार कारक है जो उसके लिए सबसे अहम है। दरअसल इस सबके लिए हमारी आर्थिक नीतियां जिम्मेवार रही हैं। इससे खेती की उत्पादकता में कमी आई और लाभ में इजाफे की उम्मीदें भी धूमिल हुईं। वर्तमान में हमारी सकल घरेलू उत्पाद के कुल हिस्से में कृषि व किसान का हिस्सा घटकर महज 18 फीसदी रह गया है, जबकि हमारे देश की 70 फीसदी से भी अधिक की आबादी आज भी खेती पर निर्भर है। कृषि और किसान के लगातार हाशिए पर जाने की यह एक अहम वजह रही है। आजादी के बाद पश्चिमी मॉडल के आधार पर अपनाए गए औद्योगीकरण से यह आशा की गई थी कि बड़ी संख्या में लोग खेती से दूसरे पेशों में जाएंगे। इससे निर्माण, वाणिज्य व सेवा क्षेत्र का विकास होने के साथ-साथ एक ओर सांस्कृतिक परिदृश्य बदलेगा तो दूसरी ओर हम औद्योगिक संस्कृति के युग में प्रवेश कर जाएंगे। हालांकि आशा के अनुरूप परिणाम न मिलने से कृषि पर जनाधिक्य का दबाव लगातार बढ़ता चला गया और हम गहरे सांस्कृतिक संकट के भंवर में फंसते चले गए। हर तरफ मौजूद संकट आज हमारे द्वारा अपनाई जा रही दूषित नीति का परिणाम है। इससे गांव और खेती-किसानी का महत्व कम हुआ है और निराशा के घटाटोप अंधेरे में घिरा किसान आत्महत्या करने के लिए विवश हो रहा है। इस संदर्भ में हमें इस तथ्य पर भी गौर करना होगा कि जहां एक ओर दिन-प्रतिदिन हमारी बढ़ती आबादी की रिहायशी जरूरतों को पूरा करने के लिए हो रहे निर्माण व विभिन्न गतिविधियों से गांवो की कृषि योग्य भूमि का आकार घटा है वहीं इस सबसे ग्रामीणों की आमदनी भी घट रही है। भूख, दमन, शोषण और ब्याज के लगातार बढ़ते बोझ के कारण देश के अनेक राज्यों में एक लाख से अधिक छोटे किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। यह सब हुआ है ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेजी से आयी गिरावट के कारण। सूखा, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के कारण यह स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है। राज्यों में चलाई जा रही विकास योजनाओं की भले ही कितनी बातें की जाती रहें, लेकिन सच्चाई यही है कि देश में उन्हीं गांवों का विकास हो पाया है जहां सिंचाई के साधनों और बिजली की समुचित व्यवस्था हो पाई है। हमारे यहां विकास कार्यो के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में जिस तरह हीलाहवाली देखने को मिलती है वह काफी निराशाजनक है। इसके अलावा इन योजनाओं के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार भी एक सबसे बड़ा बाधक है। देश में विकास दर को लेकर भले ही सरकारें और विभिन्न एजेंसियों लंबे-चौड़े दावे करें, लेकिन वास्तविकता इनके आकलन से काफी विपरीत ही होती है। यही कारण है कि इन्हें सतत औद्योगिक या ग्रामीण विकास का आधार नहीं माना जा सकत है। हमारी सरकार और विशेषज्ञ देश की 60 फीसदी आबादी को कृषि पर निर्भर बताते हैं, जबकि हकीकत में यह आंकड़ा 70 फीसदी से भी अधिक का है। यदि सरकारी आंकड़ों को सही भी मान लिया जाए तो भी सकल घरेलू उत्पाद में इनका योगदान महज 19 फीसदी ही है अथवा उससे भी कम ही है। हमारे देश और समाज में आज भी ढेर सारी विकृतियां पहले की तरह मौजूद हैं जिन्हें दूर करना आवश्यक तो है, लेकिन आसान नहीं। जब तक ग्रामीण अंचल की उत्पादकता में वृद्धि नहीं की जाती है तब तक इस तरह की समस्याएं खत्म होने वाली नहीं हैं। आज जरूरत है कि ग्रामीण अंचल में आर्थिक विकास की गति में तेजी लाई जाए और विकास प्रक्रिया में आम आदमी को भागीदार बनाया जाए। इसके अलावा बिजली व सिंचाई की योजनाओं के मामले में भी नीतिगत बदलाव लाए बिना यह कार्य असंभव है। जब तक हमारे नीति-नियंताओं के दिमाग में यह बात नहीं समझ में आती है कि गांवों के निर्माण के बिना मजबूत भारत का निर्माण कर पाना संभव नहीं है, तब तक न तो भारतीय अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल पाएगा और न ही भारतीय उद्योगों की प्रगति में तेजी आने की आशा की जा सकती है। एशियाई विकास बैंक की मानें तो आने वाले समय में देश में गरीबी बढ़ेगी। इस आंकड़े को बढ़ाने में उन किसानों की एक बड़ी संख्या होगी जो सरकार की कुनीति के चलते कृषि कार्यो को छोड़ने के लिए विवश हुए हैं, क्योंकि उनके लिए निर्माण क्षेत्र में मिलने वाले काम के अलावा दूसरे कोई अवसर शायद ही हैं। आज सेवा, आईटी, रियल एस्टेट व रिटेल क्षेत्र में रोजगार के अवसर लगातार सिमटते जा रहे हैं। नतीजा यह हुआ है कि आज गरीबी और बेरोजगारी की दर तेजी से बढ़ रही है। हमारे देश में आज तकरीबन 28 फीसदी जनता गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने को विवश है। आगामी वर्षो में इनकी तादाद 30-32 प्रतिशत का आंकडा पार कर जाने की उम्मीद विशेषज्ञों को है। इसके लिए वित्तीय नीति में व्यापक बदलाव करने होंगे और कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि क्षेत्र को और अधिक वित्तीय मदद में इजाफा करना होगा। इनके अतिरिक्त कुछ वस्तुओं पर आयात शुल्क में कटौती की भी जरूरत है। यह सही है कि तेजी से बदल रही अर्थव्यवस्था और राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते जहां हमारे महानगरों ने ग्रामीण आबादी का ध्यान अपनी ओर खींचने में कीर्तिमान स्थापित किया है, वहीं इनके श्रम का भरपूर दोहन शोषण की हद तक होने की बातें भी सामने आती रहती हैं। यहां तक कि इन शहरों के निर्माण में अपनी प्रमुख भूमिका निभाने के बावजूद इन ग्रामीण मजदूरों को हेय और उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है। आज शहरों के आवास के किरायों में काफी वृद्धि हुई है और बिजली-पानी की समस्याएं भी बढ़ी हैं, जिससे रोजगार की खोज में गांवों से आने वाले लोगों के समक्ष समस्याओं का पहाड़ खड़ा हो रहा है। हालांकि इसके लिए सरकारें इन्हें ही जिम्मेदार मान रही हैं जो एक खतरनाक प्रवृत्ति है। शहरी संस्कृति के एकछत्र साम्राज्य में ग्रामीण संस्कृति के प्रवेश से एक नया सांस्कृतिक बदलाव आया है। इसने दोनों के बीच एक विभाजन रेखा-सी खींच दी है। नतीजन शहरों में जहां पहले उच्च और मध्यम वर्ग ही अधिक थे, वहां अब निम्न वर्ग के रूप में ग्रामीण और कमजोर-पिछड़े वर्गो की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। कृषि प्रधान हमारे देश में कृषि संस्कृति की सदैव ही उपेक्षा हुई, जबकि चीन ने इसे न केवल प्रमुखता दी, बल्कि कृषि क्रांति के नए मॉडल अपनाकर लगातार औद्योगिक विकास के शीर्ष पर जा पहुंचा।इसके उलट हमारे यहां अदूरदर्शी नीति के आधार पर कृषि और किसान के दमन के आधार पर औद्योगिक विकास का सपना देखा गया और यह सिलसिला आज भी जारी है। सेज यानी विशेष आर्थिक क्षेत्र इसका एक जीवंत प्रमाण है। इतना अवश्य है कि इससे तंग आकर विवशता में किसानों को अपनी अस्मिता और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष के रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया गया है, जिसका प्रमाण किसानों के संघर्ष के रूप में देखा जा सकता है। बहरहाल, आज के हालात में गांव, खेत और किसानों की बेहतरी की उम्मीद करना बेमानी है। वह बात दीगर है कि सीआईआई और प्रधानमंत्री की पहल पर केंद्र व राज्य सरकारें पंचायत व निजी क्षेत्र की परस्पर साझेदारी से गांवों की तकदीर बदल पाने और इन्हें विकास का इंजन बना पाने में कितना सफल होंगे इसका उत्तर आने वाले समय में ही मिलेगा। इसके लिए हमें एक नए मॉडल को विकसित करने की भी जरूरत होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Sunday, January 23, 2011
उजड़ते गांवों और बढ़ते शहरों की हकीकत
गांधीजी ने कहा था कि देश खुशहाल तब होगा जब हमारे गांव खुशहाल होंगे, लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में आज हालत यह है कि समुन्नत अभियांत्रिकी और रचनात्मक चिंतन व सृजन के केंद्र गांव नहीं, बल्कि शहर हैं। कभी विश्व की सभ्यता के विकास की धुरी रहे गांव आज जाति-धर्म की संकीर्ण मानसिकता, ऊंच-नीच और अगड़े-पिछड़े की जकड़बंदी के साथ-साथ भूमि व रोजगार के अभाव के शिकार बने हुए हैं। गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन का नतीजा शहरों-महानगरों में आबादी का बढ़ता दबाव और शहरी जीवन से दूर पूरी तरह आत्मनिर्भर व विनिमय प्रणाली पर जीते गांवो का हर कहीं अभाव है। संयुक्त राष्ट्र की मानें तो इस दशक के आखिर तक दुनिया में 500 ऐसे शहर हो जाएंगे जिनकी आबादी 10 लाख अथवा उससे ज्यादा का आंकड़ा पार कर जाएगी और 2017 तक दिल्ली, मुंबई, ढाका, जकार्ता, लागोस, मेक्सिको सिटी, न्यूयार्क, साओपाउलो और टोकियो आदि महानगरों की आबादी बीस करोड़ से भी अधिक का आंकड़ा पार कर लेगी। यह अलग बात है कि 1950 में समूचे विश्व में न्यूयार्क और टोकियो ही इस श्रेणी में शामिल एकमात्र शहर थे। वर्ष 1800 में तो पूरी दुनिया की आबादी का महज तीन फीसदी हिस्सा ही शहरों में रहता था और गांव ही हमारे सभ्यता की महत्वपूर्ण धुरी हुआ करते थे। असलियत में आज बढ़ती आबादी के कारण कृषि योग्य जमीन की कमी होती जा रही है। इसके अलावा दबंग सवर्णो, पिछड़ी जातियों और भूसामंतों के बढ़ते शोषण और अत्याचार आज एक सच्चाई बन चुकी है। 16-18 घंटे जीतोड़ मेहनत के बावजूद दो जून की रोटी तक जुटा पाने में नाकाम रहने और कर्ज के जाल में जकड़ जाने के कारण विवशता में दबंगों की गुलामी कर रहे ग्रामीण अंतत: शहरों की ओर भागने अथवा पलायन को विवश हो रहे हैं। इसका एक सबसे बड़ा कारण भूख तो है ही, भय व आतंक से मुक्ति, बुनियादी सुविधाओं की कमी और स्वच्छंद रूप से जीने की अदम्य लालसा भी इसके लिए जिम्मेवार कारक है जो उसके लिए सबसे अहम है। दरअसल इस सबके लिए हमारी आर्थिक नीतियां जिम्मेवार रही हैं। इससे खेती की उत्पादकता में कमी आई और लाभ में इजाफे की उम्मीदें भी धूमिल हुईं। वर्तमान में हमारी सकल घरेलू उत्पाद के कुल हिस्से में कृषि व किसान का हिस्सा घटकर महज 18 फीसदी रह गया है, जबकि हमारे देश की 70 फीसदी से भी अधिक की आबादी आज भी खेती पर निर्भर है। कृषि और किसान के लगातार हाशिए पर जाने की यह एक अहम वजह रही है। आजादी के बाद पश्चिमी मॉडल के आधार पर अपनाए गए औद्योगीकरण से यह आशा की गई थी कि बड़ी संख्या में लोग खेती से दूसरे पेशों में जाएंगे। इससे निर्माण, वाणिज्य व सेवा क्षेत्र का विकास होने के साथ-साथ एक ओर सांस्कृतिक परिदृश्य बदलेगा तो दूसरी ओर हम औद्योगिक संस्कृति के युग में प्रवेश कर जाएंगे। हालांकि आशा के अनुरूप परिणाम न मिलने से कृषि पर जनाधिक्य का दबाव लगातार बढ़ता चला गया और हम गहरे सांस्कृतिक संकट के भंवर में फंसते चले गए। हर तरफ मौजूद संकट आज हमारे द्वारा अपनाई जा रही दूषित नीति का परिणाम है। इससे गांव और खेती-किसानी का महत्व कम हुआ है और निराशा के घटाटोप अंधेरे में घिरा किसान आत्महत्या करने के लिए विवश हो रहा है। इस संदर्भ में हमें इस तथ्य पर भी गौर करना होगा कि जहां एक ओर दिन-प्रतिदिन हमारी बढ़ती आबादी की रिहायशी जरूरतों को पूरा करने के लिए हो रहे निर्माण व विभिन्न गतिविधियों से गांवो की कृषि योग्य भूमि का आकार घटा है वहीं इस सबसे ग्रामीणों की आमदनी भी घट रही है। भूख, दमन, शोषण और ब्याज के लगातार बढ़ते बोझ के कारण देश के अनेक राज्यों में एक लाख से अधिक छोटे किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। यह सब हुआ है ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेजी से आयी गिरावट के कारण। सूखा, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के कारण यह स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है। राज्यों में चलाई जा रही विकास योजनाओं की भले ही कितनी बातें की जाती रहें, लेकिन सच्चाई यही है कि देश में उन्हीं गांवों का विकास हो पाया है जहां सिंचाई के साधनों और बिजली की समुचित व्यवस्था हो पाई है। हमारे यहां विकास कार्यो के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में जिस तरह हीलाहवाली देखने को मिलती है वह काफी निराशाजनक है। इसके अलावा इन योजनाओं के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार भी एक सबसे बड़ा बाधक है। देश में विकास दर को लेकर भले ही सरकारें और विभिन्न एजेंसियों लंबे-चौड़े दावे करें, लेकिन वास्तविकता इनके आकलन से काफी विपरीत ही होती है। यही कारण है कि इन्हें सतत औद्योगिक या ग्रामीण विकास का आधार नहीं माना जा सकत है। हमारी सरकार और विशेषज्ञ देश की 60 फीसदी आबादी को कृषि पर निर्भर बताते हैं, जबकि हकीकत में यह आंकड़ा 70 फीसदी से भी अधिक का है। यदि सरकारी आंकड़ों को सही भी मान लिया जाए तो भी सकल घरेलू उत्पाद में इनका योगदान महज 19 फीसदी ही है अथवा उससे भी कम ही है। हमारे देश और समाज में आज भी ढेर सारी विकृतियां पहले की तरह मौजूद हैं जिन्हें दूर करना आवश्यक तो है, लेकिन आसान नहीं। जब तक ग्रामीण अंचल की उत्पादकता में वृद्धि नहीं की जाती है तब तक इस तरह की समस्याएं खत्म होने वाली नहीं हैं। आज जरूरत है कि ग्रामीण अंचल में आर्थिक विकास की गति में तेजी लाई जाए और विकास प्रक्रिया में आम आदमी को भागीदार बनाया जाए। इसके अलावा बिजली व सिंचाई की योजनाओं के मामले में भी नीतिगत बदलाव लाए बिना यह कार्य असंभव है। जब तक हमारे नीति-नियंताओं के दिमाग में यह बात नहीं समझ में आती है कि गांवों के निर्माण के बिना मजबूत भारत का निर्माण कर पाना संभव नहीं है, तब तक न तो भारतीय अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल पाएगा और न ही भारतीय उद्योगों की प्रगति में तेजी आने की आशा की जा सकती है। एशियाई विकास बैंक की मानें तो आने वाले समय में देश में गरीबी बढ़ेगी। इस आंकड़े को बढ़ाने में उन किसानों की एक बड़ी संख्या होगी जो सरकार की कुनीति के चलते कृषि कार्यो को छोड़ने के लिए विवश हुए हैं, क्योंकि उनके लिए निर्माण क्षेत्र में मिलने वाले काम के अलावा दूसरे कोई अवसर शायद ही हैं। आज सेवा, आईटी, रियल एस्टेट व रिटेल क्षेत्र में रोजगार के अवसर लगातार सिमटते जा रहे हैं। नतीजा यह हुआ है कि आज गरीबी और बेरोजगारी की दर तेजी से बढ़ रही है। हमारे देश में आज तकरीबन 28 फीसदी जनता गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने को विवश है। आगामी वर्षो में इनकी तादाद 30-32 प्रतिशत का आंकडा पार कर जाने की उम्मीद विशेषज्ञों को है। इसके लिए वित्तीय नीति में व्यापक बदलाव करने होंगे और कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि क्षेत्र को और अधिक वित्तीय मदद में इजाफा करना होगा। इनके अतिरिक्त कुछ वस्तुओं पर आयात शुल्क में कटौती की भी जरूरत है। यह सही है कि तेजी से बदल रही अर्थव्यवस्था और राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते जहां हमारे महानगरों ने ग्रामीण आबादी का ध्यान अपनी ओर खींचने में कीर्तिमान स्थापित किया है, वहीं इनके श्रम का भरपूर दोहन शोषण की हद तक होने की बातें भी सामने आती रहती हैं। यहां तक कि इन शहरों के निर्माण में अपनी प्रमुख भूमिका निभाने के बावजूद इन ग्रामीण मजदूरों को हेय और उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है। आज शहरों के आवास के किरायों में काफी वृद्धि हुई है और बिजली-पानी की समस्याएं भी बढ़ी हैं, जिससे रोजगार की खोज में गांवों से आने वाले लोगों के समक्ष समस्याओं का पहाड़ खड़ा हो रहा है। हालांकि इसके लिए सरकारें इन्हें ही जिम्मेदार मान रही हैं जो एक खतरनाक प्रवृत्ति है। शहरी संस्कृति के एकछत्र साम्राज्य में ग्रामीण संस्कृति के प्रवेश से एक नया सांस्कृतिक बदलाव आया है। इसने दोनों के बीच एक विभाजन रेखा-सी खींच दी है। नतीजन शहरों में जहां पहले उच्च और मध्यम वर्ग ही अधिक थे, वहां अब निम्न वर्ग के रूप में ग्रामीण और कमजोर-पिछड़े वर्गो की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। कृषि प्रधान हमारे देश में कृषि संस्कृति की सदैव ही उपेक्षा हुई, जबकि चीन ने इसे न केवल प्रमुखता दी, बल्कि कृषि क्रांति के नए मॉडल अपनाकर लगातार औद्योगिक विकास के शीर्ष पर जा पहुंचा।इसके उलट हमारे यहां अदूरदर्शी नीति के आधार पर कृषि और किसान के दमन के आधार पर औद्योगिक विकास का सपना देखा गया और यह सिलसिला आज भी जारी है। सेज यानी विशेष आर्थिक क्षेत्र इसका एक जीवंत प्रमाण है। इतना अवश्य है कि इससे तंग आकर विवशता में किसानों को अपनी अस्मिता और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष के रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया गया है, जिसका प्रमाण किसानों के संघर्ष के रूप में देखा जा सकता है। बहरहाल, आज के हालात में गांव, खेत और किसानों की बेहतरी की उम्मीद करना बेमानी है। वह बात दीगर है कि सीआईआई और प्रधानमंत्री की पहल पर केंद्र व राज्य सरकारें पंचायत व निजी क्षेत्र की परस्पर साझेदारी से गांवों की तकदीर बदल पाने और इन्हें विकास का इंजन बना पाने में कितना सफल होंगे इसका उत्तर आने वाले समय में ही मिलेगा। इसके लिए हमें एक नए मॉडल को विकसित करने की भी जरूरत होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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