हाल में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर चार मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है और ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है। यानी हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा आप अपनी जान ले ले रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या करने वालों में 34.5 प्रतिशत की उम्र 15 से 29 साल के बीच है। हर रोज, कितने युवा अपने सपनों को हकीकत में न बदल पाने के गम में जीवन से पलायन का रास्ता अपना रहे हैं। वह युवा अपने पीछे न केवल गहरे जख्म बल्कि प्रश्नों की वह गुत्थी भी छोड़ जाते हैं, जिन्हें सुलझाना बेहद जरूरी है। भारत में लगातार बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। वि स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वि में आत्महत्या करने वालों में भारत दूसरे स्थान पर है। पिछले कुछ दशकों में भारतीय सामाजिक ढांचे में आए परिवर्तन के चलते भारतीय किशोरों के लिए आयु का यह संधिकाल बेहद कठिन बन गया है। अप्रत्याशित समृद्धि और वैीकरण के चलते, भारतीय युवाओं की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। कम समय में अधिक से अधिक पाने की चाह, सहनशीलता की कमी, गलाकाट प्रतियोगिता और निरन्तर बढ़ते दबाव से युवा अवसाद का शिकार हो रहे हैं। सफलता-असफलता के मध्य संघर्ष करता युवा, जीवन के बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा होता है और स्थिति तब और अधिक पीड़ादायक हो जाती है जब उसके कंधों पर अभिभावकों के स्वप्नों का भी दायित्व होता है। परिवार में न केवल बच्चे का सर्वागीण विकास होता है बल्कि उसे जीवन जीने की चाह और संघर्ष से लड़ने का संबल भी मिलता है। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता तो वह बच्चा जो जीवन के पड़ावों से गुजरता हुआ किशोर और युवा बनता है, बिखर जाता है। संतान के जन्म के बाद से ही माता-पिता बच्चों के लिए स्वप्न का तिलिस्म बुनने लगते हैं, जिसमें वह कदर घिर जाता है कि चाह कर भी छुटकारा नहीं पा सकता। अभिभावकों की इच्छा युवाओं पर गहरा मानसिक व भावनात्मक दबाव बनाता है। असफलता किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति को सहज स्वीकार्य नहीं होती। परन्तु यह स्थिति, किशोरावस्था व युवावस्था में बेहद संवेदनशील होती है। जब किसी युवा को लगने लगता है कि वह अपने अभिभावकों के स्वप्न को साकार नहीं कर पाएगा तो उसे जीवन तुच्छ लगने लगता है। ऐसी वेदना कहीं न कहीं उसे आत्महत्या के लिए विवश करती है। पिछले कुछ वर्षो में, सामाजिक संरचना के पारिवारिक ढांचे में आमूल चूल परिवर्तन आया है। भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह में माता-पिता दोनों कार्य कर रहे हैं। अपने ही दायरे और कॅरियर में व्यस्त, तेज गति का जीवन जीने वाले ऐसे माता-पिता के बच्चे एकाकीपन का शिकार हो रहे हैं। ऐसी पृष्ठभूमि में युवा असफलता और हताशा को पिछली पीढ़ी की तुलना में अधिक भावुकता से ले रहे हैं। शोध बताते हैं कि आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे एक कारण बच्चों को अधिकाधिक भौतिक सुख- सुविधाओं की उपलब्धता भी है। जिन बच्चों को आसानी से सब कुछ मिल जाता है उन्हें जीवन की हताशानि राशाओं का सामना करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मूलभूत तथ्य यह है कि यथार्थ और स्वप्न के मध्य धैर्य और सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है और इन सबसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है परिवार का साथ। अपनों द्वारा दिया गया विास, प्रेम और मार्गदर्शन ही बच्चों को तनाव से मुक्ति दिलाता है और यही ‘आत्महत्या’ को रोकने का एक मार्ग है।
No comments:
Post a Comment