Saturday, January 15, 2011

आबादी के बोझ तले शहर

देश के शहरों की आबादी अगले 20 सालों में दोगुनी हो जाएगी। इनके लिए आवास, यातायात, पानी, बिजली आदि सुविधाएं उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती होगी। दिल्ली में हुई अर्बन मोबिलिटी इंडिया कांफ्रेंस में विशेषज्ञों के अनुसार तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो गंभीर परिणाम होंगे। इस समय 34 करोड़ से ज्यादा आबादी देश के शहरों में रहती है, जो 2030 तक बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगी। देश में 68 शहर ऐसे होंगे, जिनकी आबादी एक करोड़ से ऊपर होगी। इन शहरों की परिवहन और आवास समस्या के लिए अभी से उपाय नहीं किए गए तो उन्हें संभाल पाना मुश्किल होगा। आज लगभग एक लाख लोगों की मौत सड़क दुर्घटना में होती है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने परिवहन व्यवस्था में सुधार की अभी तक कोई ठोस योजना भी नहीं बनाई है। मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की ताजी रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि यदि भारत मौजूदा नियोजित शहरी विकास के मार्ग पर चलता रहा तो उसके शहरों में लोगों के जीवन स्तर में भारी गिरावट आएगी। इससे मौजूदा विकास दर खतरे में पड़ सकती है। बुनियादी ढांचे की हालत बहुत खराब है और आधारभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। इसका असर देश के समकेतिक और सतत विकास की प्रक्रिया पर भी पड़ेगा। पहले भारत की कल्पना एक ऐसे देश के रूप में की जाती थी, जो दूर-दराज के क्षेत्रों, गांवों और खेतों में बसता था। लेकिन आजादी के बाद से धीरे-धीरे ही सही शहर रोजी-रोजगार के प्रमुख केंद्र भी बन गए। इसके बावजूद देश के राजनेताओं की शहरी विकास में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन गरीब और बेरोजगार ग्रामीण जनता को शहरी चमक-दमक आकर्षित करती थी। जब खेती बदहाल होने लगी तो बड़ी संख्या में लोग गांव छोड़कर शहर की ओर भागने लगे। शहरों में लोगों की बाढ़-सी आ गई और शहरी संसाधनों पर बोझ बढ़ता गया। मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और मद्रास जो कभी बेहतरीन शहर माने जाते थे, उन्हें भी झोपड़पट्टियों की बढ़ती संख्या ने बदहाल कर दिया। आज देश के 5,545 शहरों, कस्बों और शहरी बस्तियों का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां पानी, बिजली, चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाओं की मारा-मारी न हो। शहरी विकास की योजनाएं दो तीन साल में जब तक बनकर तैयार होती हैं, तब तक वे खुद पुरानी पड़ जाती हैं और उनका उन उभरते शहरों से कोई वास्ता नहीं होता। उस समय तक शहर अव्यवस्थित ढंग से फैल चुका होता है। सभी शहरों में सड़कें, फुटपाथ कई कई दिन तक खुदे पड़े रहते हैं, जिससे यातायात और पैदल चलने वालों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कहीं कोई देखने वाला नहीं है कि कहां क्या हो रहा है? केंद्र सरकार ने तो शहरों के विकास की उपेक्षा की ही, लेकिन राज्य सरकारों ने भी अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके नगर निगमों का फायदा उठाया। राज्य सरकारों ने जमीनी राजनीति को ध्यान में रखते हुए नगर निगमों में अपने चेलों को नियुक्त किया और उन्हें काबू में रखने के लिए उनका बजट नियंत्रण में रखा। नगर निगमों की आय संपत्ति कर और चुंगी शुल्क तक सीमित है, जबकि राज्य सरकार बाकी कर अपनी आय में जोड़ती है। इससे बड़े शहरों की तिजोरियां खाली हो गई और उनके अधिकारी राज्य सरकारों के मोहताज हो गये। नगर निगमों की जवाबदेही नगर की जनता को नहीं, बल्कि सीधे सरकार को है। नगर निगमों और नगर निकायों के राजनैतिक हथियार हर स्तर पर सीमित कर दिए गए हैं। शहरी विकास का प्रत्येक निर्णय राज्य सरकार जांचती है। यहां तक कि नए पदों की नियुक्तियों, बजट पास करने और संपत्ति की बिक्री से जुड़े छोटे-छोटे निर्णय भी वे खुद नहीं ले सकते। एक ओर जहां स्थानीय निकायों के पास अधिकार नहीं रहे, वहीं राज्य सरकार ने सारे अधिकार हथिया लिए, पर फिर भी वह नागरिकों की जवाबदेह नहीं है। लेकिन शहर की आमदनी शक्तिशाली राजनेता और अधिकारी मिलकर बांट लेते हैं। इससे शहरी विकास अपारदर्शी और अव्यवस्थित हो जाता है। उधर, भूमाफिया और बिल्डर राजनेताओं से साठगांठ करके जमीनें हथिया कर बड़ी-बड़ी इमारतें और कॉम्प्लेक्स बना लेते हैं। नगरों के विकास की कहीं कोई सुनियोजित और पारदर्शी योजना नहीं है। मुंबई, कोलकाता, दिल्ली जैसे बड़े-बड़े महानगरों से लेकर कानपुर, लखनऊ, आगरा, पटना, भोपाल आदि नगरों में बनी झोपड़पट्टियां शहरों की नाकामी की ही प्रतीक हैं। हमारे देश में झोपड़पट्टियों में रहने वाले 17 करोड़ लोगों की आबादी दुनिया के कम से कम पंाच देशों की जनसंख्या से ज्यादा है। इसका नतीजा है सार्वजनिक सेवाएं बदतर हो गई हैं। बड़े शहरों के कायाकल्प के लिए केंद्र सरकार ने जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिनीवल मिशन और छोटे एवं मझोले शहरों के लिए अरबन इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट स्कीम 2005-06 में शुरू की थी। इस योजना के तहत पेयजल, सीवरेज, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व जल निकासी की 6554 करोड़ की स्वीकृत विभिन्न शहरों में कार्य किया जा रहा है और 2012 में इसकी समयावधि खत्म हो जाएगी। इस योजना के लगभग पांच साल पूरे होने वाले हैं, लेकिन शहरों की पेयजल और सीवरेज की व्यवस्था में कोई ठोस सुधार वाराणसी और कानपुर जैसे नगरों के मोहल्ले में दिखाई नहीं दे रहा है। जाहिर है कि योजना के मद की धनराशि का एक बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों की जेब में चला गया है। अब केंद्र सरकार ने इन योजनाओं के तहत हुए कार्यो की जांच कराने का निर्णय लिया है। उधर हमारे नगरों पर जनसंख्या का बोझ लगातार बढ़ता गया है। एक अध्ययन के अनुसार अगले 10 वर्षो में देश की 25 करोड़ अतिरिक्त शहरी आबादी के लिए 20 करोड़ अतिरिक्त पानी कनेक्शनों और प्रसाधनों की जरूरत होगी। इनके लिए मकान और परिवहन के संसाधनों के अलावा 160 गीगावाट से ज्यादा बिजली उत्पादन की जरूरत पड़ेगी। इन मूलभूत मांगों को पूरा करने के लिए सरकार को एक खरब डॉलर का निवेश करना होगा। भविष्य में विकास दर मद्देनजर शहरी इलाकों में यातायात व्यवस्था न केवल महंगी होगी, बल्कि उसे लागू करना भी मुश्किल होगा। विकास के प्रक्रिया के लिए जरूरी है कि लोग खेती से निकलकर जीविका के अन्य साधनों को अपनाएं, लेकिन इन साधनों को मुहैया कराने की सरकार और समाज की आधी अधूरी योजनाओं के कारण शहर नरक बनते जा रहे हैं। झुग्गी-झोपड़ी शहर को चलाने वाले कामगारों की पनहगाह बनी रहेंगी। इसलिए इसे आवासीय समस्या मानने के बजाए शहरवासी उन्हें उचित स्थान दें। वे शहरीकरण प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। हमें झुग्गी मुक्त शहर का सपना देखने के बजाय अपने शहरों को उसी हिसाब से डिजाइन करना चाहिए। सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि सारा विकास कुछ शहरों में केंद्रित करके हम छोटे शहरों को उनकी लघु कलाओं और लघु उद्योगों से वंचित कर रहे हैं और बड़े महानगरों की ओर पलायन को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इससे एक सीमा के बाद बड़े दानवाकार महानगर भी अपने ही बोझ से दब जाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि हमें अपने छोटे शहरों की ओर ध्यान देना होगा। उनके बारे में यह सोचा जाए कि उन्हें पैदल चलने फिरते पार किया जा सकता है। उस नगर के सीमित दायरे में ही सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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