Sunday, January 9, 2011

राष्ट्रीय राजमार्ग या अराजक मार्ग

देश में यूं तो सड़क निर्माण की रफ्तार पहले ही सुस्त है। सड़क महकमे के मुखिया कमलनाथ रोजाना बीस किलोमीटर सड़क बनाने का वादा पूरा करने में नाकाम रहे हैं। मगर जो सड़कें बन रही हैं उनकी गुणवत्ता ऐसी नहीं है कि तारीफ की जा सके। पहले बन चुकी सड़कों की मरम्मत, रखरखाव और उन्हें चौड़ा करने के काम में भी कोताही नजर आती है। जबकि इन सड़कों पर टोल की दरें दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। इस लिहाज से सबसे बढि़या उदाहरण राजमार्ग संख्या आठ का है जिस पर हाल में इस कॉलम के लेखक ने खुद अपनी कार से सफर किया। तकरीबन नौ साल पहले जब दिल्ली से जयपुर के बीच यह चार लेन की शानदार सड़क बनी थी, तब भी लेखक ने इस पर भ्रमण किया था और सुखद अनुभव का अहसास किया था। मगर नया अनुभव निराशाजनक रहा। जगह-जगह जाम, टूटफूट और मरम्मत की खामियों और अराजकता ने इस राजमार्ग को पहले की दो लेन वाली स्थिति में पहंुचा दिया है। जिस तरह से इस रास्ते पर वाहनों का दबाव कई गुना बढ़ा है, उसके मुकाबले इस पर रखरखाव की कोशिशें कम पड़ रही हैं। ऊपर से इस सड़क को चौड़ा करने का नया काम बड़े अजीबोगरीब ढंग से चल रहा है। कहीं तो सड़क को छह लेन तो कहीं आठ लेन में बदलने की मिश्रित कवायद हो रही है। इस क्रम में सड़क पर जगह-जगह डायवर्जन दिए गए हैं जिन्हें ठीक ढंग से व्यवस्थित नहीं किया गया है। पूरे रास्ते थोड़ी-थोड़ी दूर पर सड़क पर नई सतह इस बेढंगे तरीके से बिठाई गई है कि दुर्घटना का अंदेशा रहता है। जहां नई सतह शुरू और खत्म होती है वहां उसे पुरानी सतह के साथ ठीक से समायोजित नहीं किया गया है। नतीजतन तेज गति से जा रहे वाहन पहले अचानक ऊपर को और फिर कुछ देर बाद नीचे को जंप मारते हैं। ऐसी जगहों पर कहीं भी गति सीमा की चेतावनी नहीं दी गई है और न ही सावधानी का बोर्ड लगाया गया है। यह चालकों पर है कि वे खुद ही सावधानी बरतें, अन्यथा दुर्घटना का शिकार हों। दिल्ली से जयपुर जाने वाले वाहन चालक को चार जगह टोल टैक्स देना पड़ता है। पहला टोल दिल्ली-गुड़गांव एक्सप्रेस-वे पर, लेकिन वह खलता नहीं, क्योंकि धौलाकुआं से उद्योग विहार तक आठ लेन के एक्सप्रेस-वे पर किसी तरह की दिक्कत नहीं होती और वाहन मजे से दौड़ते हैं। इसके बाद जहां से एनएचएआई का इलाका शुरू होता है, वहां टोल की वसूली तो बढ़ती जाती है, लेकिन सड़क की गुणवत्ता घटती जाती है। एनएचएआई के पहले टोल प्लाजा से आखिरी टोल प्लाजा तक तकरीबन ढाई सौ किलोमीटर की दूरी पर तीन जगह कार चालकों से क्रमश: 25, 43 एवं 89 रुपये की दर से कुल 157 रुपये की टोल वसूली की जाती है। ट्रकों और अन्य बड़े कॉमर्शियल वाहनों से वसूली काफी ज्यादा है। इसके बावजूद आधे से ज्यादा रास्ते पर सड़क का रखरखाव अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। सबसे बड़ी समस्या रास्ते के तीन कस्बों पर लगने वाले जाम की है। मानेसर, शाहपुर और कोटपूतली में कस्बे के बीचोंबीच से सड़क निकलने वाली सड़क कभी निर्बाध हुआ करती थी। अभी तो यह हाल है कि दो लेन की सड़क पर दोनो ओर अक्सर एक-एक किलोमीटर तक जाम लगता है। कोटपूतली और शाहपुर में हाईवे पर ही कई चौराहे और तिराहे हैं जहां स्थानीय ट्रैफिक अपने हिसाब से हाईवे को क्रास करता है। इसके अलावा इन जगहों पर दोनों ओर ट्रकों की मरम्मत का मार्केट भी खुल गया है जो पहले से संकरे रास्ते को और संकरा बना देता है। जाम की समस्या से निपटने के लिए एनएचएआई ने इन कस्बों में एलीवटेड रोड बनाने की शुरुआत तो की है, लेकिन दो-चार खंभों से आगे काम बढ़ता नहीं दिखता। बल्कि इससे दिक्कत और बढ़ गई है। मानेसर और धारूहेड़ा में डिवाइडर पर कई जगह अवैध कट बना दिए गए हैं जहां लंबे-लंबे कंटेनर ट्रक जब-तब एक ओर से दूसरी ओर जाने की जिद में आड़े होकर अटक जाते हैं। इससे तेज चलने वाले वाहनों की रफ्तार एकाएक थम जाती है। पूरे रास्ते ट्रकों के खड़े होने के लिए कहीं भी अलग लेन चिन्हित नहीं की गई हैं। इससे ट्रक वाले सड़क किनारे अपने वाहन खड़े कर देते हैं और चालू यातायात में बाधक बनने के साथ खतरा भी पैदा करते हैं। कुल मिलाकर दिल्ली से जयपुर के बीच यातायात कहीं 100 तो कहीं 20 किलोमीटर की रफ्तार से चलता है जिससे औसत रफ्तार 50 किलोमीटर भी नहीं रहती। नतीजतन जो सफर दूरी के हिसाब से अधिकतम चार घंटे में तय होने लगा था उसमें अब फिर से छह-सात घंटे लगने लगे हैं। यानी जहां से चले थे वहीं फिर पहंुच गये हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम का यह उद्देश्य तो नहीं था।

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