बिहार में नीतीश कुमार की कामयाबी ने साबित किया है कि देश का मतदाता अब धर्म-जाति की राजनीति के बजाय विकास की राजनीति को समर्थन देने को बेताब है। बिहार से पहले गुजरात और दिल्ली में विकास की राजनीति की विजय हुई थी। इन तीन राज्यों ने देश के दूसरे राज्यों की राजनीति में विकास को केंद्र में ला दिया है और अब वहां भी विकास प्रमुख एजेंडा बन गया है। हालत यह है कि जब बिहार में सड़कों की स्थिति सुधरने लगी तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी सड़कों का हुलिया बदलने की मुहिम तेज हो गई है। बिहार में बिजली परियोजनाओं का लंबा-चौड़ा खाका खिंचते देख अब उत्तर प्रदेश भी विद्युत परियोजनाओं का बड़ा एजेंडा तैयार करने को विवश हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी हाल में साढ़े पांच हजार मेगावाट की बिजली परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार की है। मुख्यमंत्री मायावती कह रही हैं कि वह 2014 तक राज्य को बिजली के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बना देंगी। और तो और राष्ट्रमंडल खेलों में दिल्ली का हुलिया बदलने के बाद उत्तर प्रदेश में भी शहरों की हालत सुधारने की दिशा में काम शुरू हुआ है। लखनऊ यूं तो पहले भी बेहतर था, लेकिन अब यहां बड़े पैमाने पर सुंदरीकरण के कार्य कराए जा रहे हैं। यहां तक कि कानपुर और आगरा के अलावा छोटे नगरों की सड़कें भी बनती देखी जा रही हैं। राजनीतिक मजबूरियां कोई भी हों, लेकिन विकास के मामले में बिहार, गुजरात तथा दिल्ली के बाद मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भी विकास की राह पर चल पड़े हैं और ये सब मिलकर दूसरे राज्यों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं। इन मुख्यमंत्रियों ने दूसरे पिछड़े राज्यों को भी सपने देखना सिखाया है। इन्होंने दिखा दिया है कि किस तरह केंद्र के सहयोग के बगैर कल्पनाशीलता और दृढ़संकल्प के बल पर विकास की मुहिम में जनता और निजी क्षेत्र को भागीदार बनाया जा सकता है। इनकी विकासमूलक सोच का असर केंद्र सरकार के अलावा दूसरे देशों की सरकारों पर भी पड़ रहा है और अब वे अपना नजरिया बदलकर सहयोग को आगे आ रहे हैं। बिहार में पहली बार ऐसा देखने में आ रहा है कि निजी कंपनियां निवेश के लिए बढ़-चढ़कर आगे आने लगी हैं और उन्होंने बुनियादी ढांचा विकास से जुड़ी परियोजनाओं में हिस्सेदारी के लिए कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। मध्य प्रदेश में हाल ही में देश-विदेश की अनेक निजी कंपनियों ने प्रदेश सरकार के साथ हजारों करोड़ रुपये के निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। नक्सल आक्रांत छत्तीसगढ़ ने नक्सलियों से लोहा लेने के साथ-साथ विकास की मुहिम छेड़ पश्चिम बंगाल को रास्ता दिखाया है। छत्तीसगढ़ की देखादेखी अब झारखंड भी इसी रणनीति पर काम करने को उत्सुक दिखाई दे रहा है। राज्य के नए मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा इस बार बदले-बदले नजर आ रहे हैं और राज्य में बुनियादी ढांचे का विकास उनके एजेंडे में प्रमुख है। नक्सलियों के खिलाफ केंद्र सरकार की रणनीति को भी उन्हीं राज्यों में कामयाबी मिल रही है जो विकास को लेकर अपनी ओर से पहलकदमी कर रहे हैं। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल जैसे जिन नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारों में इस तरह की पहल का अभाव है, वे अपनी जनता की नाराजगी मोल लेने का जोखिम उठा रहे हैं। जहां तक दक्षिण भारतीय राज्यों की बात है तो उनकी स्थिति थोड़ी अलग है। ये राज्य विकास को लेकर पहले से ही अपेक्षाकृत ज्यादा सतर्क रहे हैं। नतीजतन, उत्तर भारत के राज्यों के मुकाबले यहां बुनियादी ढांचे की स्थिति कमोबेश बेहतर है। खासकर तमिलनाडु व कर्नाटक में निजी कंपनियां काफी तेजी से बुनियादी ढांचे में निवेश कर रही हैं। हाल में बेंगलूर में निजी क्षेत्र की मदद से बने शानदार नए हवाई अड्डे और उससे शहर को जोड़ने वाली फर्राटा नई सड़क को देखकर सुखद आश्चर्य होता है। चेन्नई का एयरपोर्ट, वहां की सड़कें तथा तमिलनाडु में राजमार्गो की सामान्य स्थिति भी इसीलिए अच्छी है, क्योंकि इस राज्य की सरकारों ने राजनीति के चक्कर में विकास की उपेक्षा नहीं की है। इसीकारण देश-विदेश की निजी कंपनियों ने भी यहां निवेश को तरजीह दी है। आंध्र प्रदेश में हैदराबाद का एयरपोर्ट और शहर की सड़कें तो बढि़या हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। खासकर तेलंगाना क्षेत्र में सड़कें बदहाल हैं। तेलंगाना को लेकर वर्षो से चल रहा राजनीतिक झंझावात इसके लिए जिम्मेदार है। यदि इस क्षेत्र के विकास को वाजिब तवज्जो दी गई होती तो शायद अलग तेलंगाना की बात ही नहीं उठती। साफ है कि देश के जिन-जिन इलाकों में विकास की उपेक्षा की गई है और बढ़ती जनसंख्या और उसकी जरूरतों के मुताबिक बुनियादी ढांचे का विकास नहीं हुआ है वहां देर-सबेर राजनीतिक अस्थिरता की समस्या पैदा हुई है। इन राज्यों में मतदाताओं की नई पीढ़ी राजनीतिक दलों की पुरानी ढंग की राजनीति से आजिज आ चुकी है। उसे अच्छी सड़कें, अच्छे स्कूल, अच्छे अस्पताल, हवाई अड्डे, चौबीस घंटे बिजली और स्वच्छ पानी चाहिए। जिन राजनीतिक दलों को अभी तक यह बात समझ में नहीं आई हो उन्हें संभल जाना चाहिए।
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