कृषि आर्थिक मामलों के जानकार देविन्दर शर्मा से शशि प्रकाश राय की बातचीत
दौड़ते दामों पर फौरी काबू पाने के लिए सबसे पहले तो बाजार को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने की जरूरत है। विचौलियों, जमाखोरों और सट्टेबाजों पर नकेल कसी जानी चाहिए। खाद्यान्न के निर्यात की नीति में देश के तकाजों की उपेक्षा नहीं जाए। महंगाई पर विचार के लिए गठित नरेंद्र मोदी समिति के सुझाव के अनुसार कृषि उत्पादों के वायदा बाजार पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए। दीर्घकालीन उपायों में कृषि और किसानों को ज्यादा सशक्त किया जाना चाहिए। किसानों को बोझ नहीं अन्नदाता माना जाना चाहिए। वह खाद्य सुरक्षा की बुनियाद हैं। उन्हें मजबूत किये बिना भूख और महंगाई के खिलाफ जंग जीती नहीं जा सकती
बढ़ती महंगाई की आखिर वजह क्या है?
बेहिसाब बढ़ती इस महंगाई की कोई तार्किक वजह मुझे तो नजर नहीं आती। पैदावारों की कमी को इसका कारण बताया जा रहा है लेकिन इस बात में दम नहीं है। मसलन, प्याज का ही उदाहरण लें। प्याज की हमारे यहां तीन फसलें पैदा होती हैं। इस बार प्याज का कुल उत्पादन पिछले वर्ष से अधिक हुआ है। जिस खरीफ की फसल के खराब होने को बढ़ी कीमतों की वजह बताया जा रहा है उसकी प्याज की कुल उपज में 40 फीसद हिस्सेदारी होती है । अगर यह मान लें कि इसका 10 फीसद बारिश के चलते खराब हो गया तो कुल वाषिर्क उत्पादन में अधिकतम लगभग पांच फीसद की कमी हुई। ऐसे में प्याज कीमतों में बढ़ोतरी के लिए यह तर्क केवल एक बहाना है।
दोषपूर्ण आयात-निर्यात नीति का महंगाई बढ़ाने में कितना योगदान है?
महंगाई का सीधा संबंध आयात-निर्यात के बारे में लिए गए गलत फैसलों से है। दुनिया के एक-तिहाई भूखे लोग भारत में रहते हैं। इसके बावजूद हम खाने-पीने की जरूरी चीजों का निर्यात करते हैं जबकि अमेरिका में हालात विपरीत हैं। वहां की कुल आबादी लगभग 32 करोड़ है तथा तकरीबन 16.8 करोड़ कुत्ते-बिल्ली जैसे पालतू जानवर हैं। अमेरिकी सरकार प्रतिवर्ष इनके खाने-पीने की जरूरतों के आकलन के बाद ही खाद्यान्न के निर्यात की बात सोचती है। इसके उल्ट हमारे यहां खाद्य असुरक्षा के बावजूद पहले तो सस्ते भाव पर निर्यात किया जाता है फिर महंगाई बढ़ने पर उन्हीं चीजों का ऊंचे दामों पर आयात होता है। हमारे देश लगभग 32 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं, ऐसे में खाद्य वस्तुओं की अतिरिक्त उपलब्धता दिखाकर निर्यात करना किसी अपराध से कम नहीं है। चीनी का उदाहरण सामने है। हम वि के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक देश हैं। 2009 में बिना समुचित विचार किए चीनी का पहले तो निर्यात कर दिया गया। जब घरेलू बाजार में चीनी के दाम बढ़ने लगे तो सरकार को महंगा आयात करना पड़ा। हमारे जैसे बड़े खरीदार के बाजार में उतरने से चीनी की कीमतों का 40 साल का रिकॉर्ड टूट गया। लेकिन लगता है सरकार ने इससे कोई सबक नहीं सीखा। शायद तभी इस वर्ष भी 5 लाख टन चीनी के निर्यात का फैसला ले लिया गया है। साथ ही पिछले सौदों के नाम पर चीनी का 11 लाख टन निर्यात और होगा। इसके अलावा चीनी के वायदा व्यापार की अनुमति भी फिर से दे दी गई है। नतीजा यह कि पिछले दिनों में ही चीनी के दाम 10 फीसद तक बढ़ चुके हैं। खबरें आ रही हैं कि वि के सबसे बड़े चीनी उत्पादक ब्राजील में इस वर्ष पैदावार कम हुई है। यह मात्र एक बानगी है कि कैसे गरीबों को भूखा रखकर अतिरिक्त उपलब्धता दिखाकर पहले तो जरूरी चीजों का निर्यात होता है, फिर महंगे दामों पर आयात किया जाता है। इस खेल में करोड़ों के वारे-न्यारे होते हैं और गरीब भूख से बिलखते रहते हैं।
यह कहना कितना उचित है कि लोगों की खरीद क्षमता बढ़ने के चलते मांग बढ़ी है जो महंगाई का कारण है?
योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का यह कथन सचाई से बेहद दूर है। उनके और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के बयान में काफी समानता है। जार्ज बुश ने भी कहा था कि चूंकि भारतीय ज्यादा खाने लगे हैं इसलिए वि में महंगाई बढ़ रही है। बुश तो भारत की सचाई से नावाकिफ होंगे लेकिन अहलूवालिया तो सब जानबूझकर ऐसे अतार्किक बयान दे रहे हैं। उनका कहना है कि मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना) से लोगों की क्रयशक्ति बढ़ी है जिसके चलते खाद्य वस्तुओं की डिमांड बढ़ी है जबकि नेशनल सैंपल सव्रे आग्रेनाइजेशन(एनएसएसओ) के मुताबिक पिछले 15 सालों में भारत में अन्न की खपत घटी है। गांवों में हालात ज्यादा खराब हुए हैं। वास्तविकता तो यह है कि यदि हमारी पूरी आबादी भरपेट खाना खाने लगे तो इसकी पूर्ति शायद चंद्रमा से आयात द्वारा भी संभव न हो। न केवल खाद्यान्न बल्कि दूध, अंडे और मीट जैसे पौष्टिक पदाथरे की खपत भी घटी है। ऐसे में 2008 से कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से जमीनी स्तर पर हालात और बिगड़ने का अंदेशा है। साथ ही जब गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ रहा हो तो ऐसे में मांग बढ़ने की बात कहना विरोधाभासी है।
मुद्रास्फीति के लिए बिचौलिए किस हद तक जिम्मेदार हैं?
निश्चित रूप से विचौलियों का संगठित नेटवर्क भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। उत्पादक और उपभोक्ता के बीच इनकी मौजूदगी के चलते किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। संग्रहण क्षमता के अभाव में उसे अपनी उपज लागत से भी कम मूल्य पर बेचने को मजबूर होना पड़ता है लेकिन जब उसी वस्तु और अन्य खाद्य उत्पादों को खरीदने वह बाजार जाता है तो उसे इसका कई गुना मूल्य चुकाना पड़ता है। बिचौलिया नेटवर्क मनमाने ढंग से दामों को नियंत्रित करता है और बेहिसाब मुनाफा कमाता है। अंडा इसका एक सटीक उदाहरण है। अन्य उत्पादों के विपरीत इस बारे में दावे से कहा जा सकता है कि मुर्गियों ने तो अंडा देना बिल्कुल कम नहीं किया। फिर क्या वजह है कि एक ओर इसके दाम बढ़े हैं तो दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर उनके दामों में आश्चर्यजनक समानता भी है। जवाब यह कि कुछेक लोग ही देश में अंडे को दामों को नियंत्रित करते हैं। ऐसा ही खेल दूसरी चीजों के मामले में भी है। दिल्ली की आजादपुर मंडी में बिचौलिए एक घंटे के भीतर किसी भी सब्जी के दाम 50 से 400 फीसद तक बढ़ा देते हैं। उनका नेटवर्क आढ़तियों से लेकर फेरीवालों तक फैला है। महंगाई को लेकर आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हमारे राजनीतिक दलों को इस बारे में बखूबी पता है। लेकिन अपनी आर्थिक ताकत की बदौलत बिचौलियों ने इनमें अपनी मजबूत घुसपैठ बना रखी है। चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी या अन्य कोई दल, सभी में विभिन्न वस्तुओं के ट्रेडर्स संगठनों के पदाधिकारी अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। लिहाजा, सरकार किसी की भी हो इनके हित सुरक्षित रहते हैं लेकिन इसका खमियाजा महंगाई के रूप में देश की जनता को भुगतना पड़ रहा है।
खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति से भागते दामों पर फर्क पड़ेगा?
रिटेल सेक्टर में एफडीआई से हालात सुधरेंगे नहीं बल्कि लगता है कि इस गैरवाजिब महंगाई के पीछे रिटेल में विदेशी निवेश को जायज ठहराने के हालात बनाए जा रहे हैं। भारत पर अपने खुदरा क्षेत्र को खोलने का दबाव लगातार बनाया जा रहा है। जी-20 की मीटिंग में भी भारत को ऐसा करने को कहा गया है। इसलिए संभव है कि सोचे-समझे ढंग से महंगाई बढ़ाकर रिटेल में एफडीआई की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही हो।
क्या दोषपूर्ण कृषि नीतियों ने भी महंगाई बढ़ाने में हाथ बंटाया है?
हमारी कृषि नीति पूरी तरह विदेशी प्रभाव में तय की जा रही है। सरकार संदेश देना चाहती है मानो उसे किसानों की जरूरत ही नहीं है। र्वल्ड बैंक ने 2008 में कहा था कि भूमि एक ‘प्रोडक्टिव असेट’ है। लिहाजा उसे किसानों से लेकर उद्योगों को दे दिया जाना चाहिए। लगता है, सरकार भी ऐसा सोचती है। तभी वह उपजाऊ भूमि को लगातार उद्योगों को दे रही है। बाजारवाद से प्रभावित हमारे नीति नियंता मानते हैं कि देश में 70 फीसद सरप्लस किसान हैं। इसलिए योजनाबद्ध ढंग से किसानों को खेती से दूर करने की साजिश की जा रही है। सरकार सोचती है कि हमारी 30 फीसद तक खाद्य जरूरतें आयात से पूरी की जा सकती है जबकि 2008 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्यान्न अनुपलब्धता के चलते दुनिया के कई देशों में दंगे तक हो गए थे। खाद्यान्न के अभाव में एक सप्ताह पूर्व अल्जीरिया में दंगा हो भी चुका है। लिहाजा, हमारी व्यापक खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर होना दरअसल बड़े संकट को न्योता देना है।
फिलहाल महंगाई पर नियंतण्रके फौरी और दीर्घकालिक उपाय क्या हैं
सबसे पहले तो बाजार को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने की जरूरत है। विचौलियों, जमाखोरों और सट्टेबाजों पर नकेल कसी जानी चाहिए। महंगाई पर विचार के लिए गठित नरेंद्र मोदी समिति के सुझाव के अनुसार कृषि उत्पादों के वायदा बाजार पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए। दीर्घकालीन उपायों में कृषि और किसानों को ज्यादा सशक्त किया जाना चाहिए। किसानों को बोझ न मानकर अन्नदाता के तौर पर देखा जाना चाहिए। किसान खाद्य सुरक्षा की बुनियाद हैं। उन्हें मजबूत किये बिना भूख और महंगाई के खिलाफ जंग जीती नहीं जा सकती।
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