Saturday, January 1, 2011

भारत की विविधता का संगम

केवल कर्नाटक, आंध्र प्रदेश या महाराष्ट्र के लगने वाले आसपास के क्षेत्रों के लिए ही नहीं, देश के लिए यह अद्भुत समागम है। कर्नाटक के गुलबर्गा जैसे छोटे जगह में पूरे भारत की विविधता का एक विशाल संगम का यहां साक्षात हो रहा है। सरकारी ढांचे से परे देसी संसाधान, स्थानीय ज्ञान, आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर वर्तमान विकास ढांचा का कोई न कोई विकल्प खड़ा करने वाले या इस दिशा में काम करने वालों के साथ अहिंसात्मक परिवर्तन के लिए सक्रिय लोगों के इतने बड़े सम्मेलन का यह पहला अवसर है। दुनिया के कुछ सोचने वालों ने मिलकर व‌र्ल्ड सोशल फोरम के नाम से एक समागम आरंभ किया, लेकिन वहां भी इतनी संख्या में अपने आप आने वालों का दृश्य नहीं था। वास्तव में भारत विकास संगम का यह तीसरा राष्ट्रीय संगम ऐसे सभी सम्मेलनों से अलग और ज्यादा परिणामकारी होगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। इसका नाम दिया गया है, कलबुर्गी कंपु। कलबुर्गी गुलबर्गा का ऐतिहासिक नाम है और कंपु कन्नड़ भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है सुगंध। नाम से भी इसका उद्देश्य स्पष्ट होता है। जब कोई बड़ी घटना घटती है तो उसका शोर चारों ओर होता है और उसे हम जान पाते हैं, लेकिन कुछ ज्यादा अहम परिवर्तन स्वाभाविक तौर पर अपने आप घटित होता है, जो समाज को तो बदल देता है, पर वह कुछ घंटे या कुछ दिनों के अंतराल की ऐसी परिघटना नहीं होती, जिसकी गूंज उस रूप में सुनाई दे, लेकिन वह स्थायी होता है और बड़े स्थापित ढांचों की चूलें हिला देता है। यह सम्मेलन ऐसे ही परिवर्तनों की आधारभूमि बनने का संकेत दे रहा है। भारत विकास संगम के संस्थापक और इस संगम के प्रेरणास्त्रोत केएन गोविंदाचार्य से बातचीत में यह स्पष्ट हो जाता है कि जब वे करीब नौ वर्ष पहले भाजपा से बाहर हुए थे तो उन्हें भी यह कल्पना नहीं थी कि वे इस दिशा में कुछ काम कर जाएंगे, लेकिन अध्ययन एवं प्रवास के साथ धीरे-धीरे भारत की आवश्यकता एवं क्षमता की समझ विकसित होने के साथ कुछ योजनाएं अंतर्मन में साकार होने लगीं और उसी की एक परिणति भारत विकास संगम है। उनके पूर्व सहयोगी एवं पूर्व मंत्री बसवराज पाटिल सेड़म ने भारत विकास संगम का दायित्व लेकर इसे व्यापक स्वरूप दिया। इसके पीछे सोच यही थी कि देश भर में या इसके बाहर जो कोई भी भारत को धीरे-धीरे नष्ट करने वाली तथा एक-एक व्यक्ति को उसके जीवन की सामान्य जरूरतों तक के लिए परावलंबी बना देने वाली मौजूदा आर्थिक व्यवस्था के विकल्प के तौर पर कुछ काम कर रहे हों, उनमें जो सफल हुए उनका और जो सफल न हुए उनका भी, जो इस दिशा में कुछ सोच रखते हैं या फिर जो ऐसे आंदोलन या अभियान चला रहे हैं, उन सबका समय-समय पर एक संगम बुलाया जाए, जिसमें वे एक-दूसरे से अपना अनुभव बांटे, उनके बीच संपर्क और सहकार बने तथा उस क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा उनका मार्गदर्शन हो सके। इसी सोच की परिणति है, यह तीसरा संगम। जिनने पहले या दूसरे संगम में भाग लिया, उनको भी यहां आने के पहले यह कल्पना नहीं थी कि वाकई इस बार का संगम सिंधु सदृश हो जाएगा। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 25 दिसंबर को यहां संबोधन के लिए आए थे। उनकी टिप्पणी थी कि इससे पूर्व इतनी भारी संख्या में एक साथ इतने बच्चों, शिक्षकों एवं अभिभावकों के साथ उनको बातचीत करने का मौका नहीं मिला था। वह ऐसा संगम था, जिसमें जहां नजर जाती थी, बच्चों, शिक्षकों एवं अभिभावकों का सैलाब नजर आता था। डॉ. कलाम के काफिले को भी कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। यह आने वाली पीढ़ी के अंदर भारत को समझने, सच्चा भारतीय बनने और जीवन में भारत को केंद्र में रखकर एक व्यापक लक्ष्य की दिशा में ज्ञान अर्जित करने की उत्प्रेरणा का कार्यक्रम था। इसी प्रकार 23 दिसंबर से आरंभ दस दिनों तक आर्थिक व्यवस्था के अलग-अलग पहलुओं पर विमर्श, उद्बोधन एवं प्रश्नोत्तर का कार्यक्रम चल रहा है। ज्ञान शक्ति संगम, उद्योग शक्ति संगम, आरोग्य शक्ति संगम, धर्म शक्ति संगम, ग्राम और कृषि शक्ति संगम, सेवा शक्ति और अंतिम दिन भारत कुंभ। उद्यम और जीवन जीने का कोई पहलू इनसे अछूता नहीं है। इन मुख्य कार्यक्रमों के समानांतर अलग-अलग विमर्श, परिचयात्मक एवं सेमिनारनुमा कार्यक्रम भी चल रहा है। गोष्ठियों और सेमिनारों में अलग-अलग विधाओं में कार्यरत एवं उनमें विशिष्टता प्राप्त करने वालों के बीच जीवंत बहस एवं संवाद से बनता वातावरण किसी न किसी मात्रा में बदलाव की चेतना जगाने वाला साबित होगा। इसके साथ यहां लगी प्रदर्शनियां भी विचार-विमर्श के इन कार्यक्रम के साकार रूप जैसे हैं। किसी के अंदर वैकल्पिक आर्थिक ढांचे को लेकर कुछ संदेह है तो इन प्रदर्शनियों को देखने या उनके अन्वेशकों की बातों से वे बहुत हद तक दूर हो जातीं हैं। यह इस संगम की विशिष्टता है, जो ऐसे दूसरे सम्मेलनों से इसे अलग करती है। इस कार्यक्रम के लिए 35 एकड़ में पूर्ण नियोजित निर्माण हुआ और आगंतुकों के ठहरने की व्यवस्था अलग है, लेकिन किसी को यह संदेह नहीं होना चाहिए कि इन सारी व्यवस्थाओं के लिए सरकार से किसी स्तर पर मदद ली गई है। हां, कर्नाटक सरकार ने इस आयोजन की सूचना मिलने पर व्ययभार वहन करने का प्रस्ताव अवश्य दिया था, जिसे इस पूरे कार्यक्रम के शिल्पी बसवराज पाटिल ने विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। सरकार का कोई सहयोग है तो इतना कि बिजली एवं पानी के कनेक्शन समय पर लग गए। बाहरी सुरक्षा की जिम्मेवारी पुलिस संभाल रही है, किंतु आंतरिक सुरक्षा में पुलिस की कोई भूमिका नहीं है। इस प्रकार अपनी कल्पना के अनुरूप यह संपूर्ण रूप से भारत की आम जनता का संगम है। इसका आरंभ भी आम जन के सहयोग से हुआ और अंत भी आम जन के अंदर रचना और संघर्ष दोनों स्तरों पर बदलाव की उद्घोषणा के साथ होगा। भारत एवं दुनिया के सामने आरोपित आर्थिक व्यवस्था एवं उनका पोषण करने वाले वर्तमान राजनीतिक ढांचों के द्वारा और स्वयं उनके अंदर पैदा होने वाले संकटों, उभर रही चुनौतियों को समझने वालों के लिए ऐसे आयोजनों की अपरिहार्यता स्पष्ट है। पूरे देश में आप कहीं भी जाइए, आम जनता का दूभर होता जीवन, आम जरूरतों की पूर्ति में दिनोंदिन बढ़ रही कठिनाइयां, इन कारणों से उनके अंदर व्यवस्था के प्रति बढ़ता असंतोष महसूस किया जा सकता है। स्थानीय स्तरों पर निर्माण कार्य भी हो रहे हैं और असंख्य आंदोलन एवं अभियान भी चल रहे हैं। इन सबको राष्ट्रीय स्तर पर एकत्रित कर एक-दूसरे के बीच सहयोग, सहकार स्थापित न होने के कारण इनमें से ज्यादातर स्थानीय स्तर पर सिमट जाते हैं, अपरिपक्व अवस्था में ही मर जाते हैं या फिर पूंजी और सत्ता की ताकत उनके नेतृत्व को निगल जाती है। ऐसे संगम उनके अंदर यह आत्मविश्वास पैदा कर पाते हैं कि वे अकेले नहीं, दूसरों के ज्ञान और अनुभव से उनकी कमियां या अपरिपक्वता दूर हो सकती हैं, इन सबके बीच सहकार के साथ रचना और संघर्ष के इन अभियानों को एक राष्ट्रीय स्वरूप देकर राष्ट्रव्यापी बदलाव का ढांचा खड़ा हो सकता है। गुलबर्गा संगम इस दिशा में जितनी प्रगति कर सकेगा, वह भारत एवं दुनिया के लिए उसका महत्वपूर्ण योगदान होगा। यहां के वातावरण एवं आने वालों के विचार तथा तौर-तरीकों से कम से कम कलबुर्गी कंपु नाउम्मीद पैदा नहीं करती। इसलिए हम, आप और सबको यह कामना करनी चाहिए कि कलबुर्गी से निकला भारत के नवनिमार्ण का सुगंध पूरे देश में चेतना जागरण का वाहक बन जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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